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02 फ़रवरी 2011

सुरेश चिपलूनकर होने के मायने..


आम हिन्दुस्तानी की आवाज को जरूरत है हमारी-आपकी ताकत की !! मीडियाई भ्रष्टाचार के इस माहौल में एक ईमानदार विकल्प देने की पहल को अनसुना कर दिया तो कल हमारी कोई नहीं सुनेगा.

भारतीय पत्रकारिता ने प्रिंट से होते हुए इलेक्ट्रोनिक मीडिया और फिर वेब मीडिया में अपनी दस्तक दे दी है. इसके समानांतर ब्लोगिंग ने भी अपने पाँव पसारे. मुख्यधारा के मीडिया कहे जाने वाले प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक में कुछ राष्ट्रवादी अपवादों को छोड़कर अधिकाँश हिस्सा ‘वाम और वंश’ की अराधना में मग्न है. सेकुलरवाद के नाम पर ऐसा करना सुविधाजनक भी है, और फायदे का सौदा भी. आप खा-पीकर वाम-वंश की साधना कर सकते हैं, उनकी भ्रष्ट करतूतों पर परदा डाल सकते है, और इस तरफदारी के कारण के लिहाज से 'सेकुलरिज्म' (वह सेकुलरिज्म जिसकी परिभाषा चर्च या जेहादी तय करते हैं ) का हवाला दे सकते हैं. (राडिया के कारण -बुर्का दत्त-प्रभु चावला-राजदीप सरदेसाई (सी डी खाऊ) जैसे 'महान सेकुलर' पत्रकारों की असलियत तो हम जान ही चुके हैं) यानी हिन्दुस्तान में नेतागिरी से लेकर मीडियागिरी में आप सेकुलर हो तो बहुत फायदे में रहोगो, बहुत से सवालों से ऊपर रहोगे!!

लेकिन इस माहौल में भी कुछ बन्दे राष्ट्रवाद और सचाई की मशाल जलाने की गुस्ताखी कर रहे हैं. उज्जैन निवासी सुरेश चिपलूनकर भी उन गिने-चुने दुस्साहसी लोगो में हैं जो पिछले कई वर्षो से यह 'घाटे का असुविधाजनक'  काम कर रहे हैं. आला दर्जे के गाँठ के गोपीचंद बनकर लिखने वाले सुरेश जी के पीछे ना तो कोई सत्ता-प्रतिष्ठान है और ना ही किसी चर्च या खाड़ी देश का पोषण. और तो और वह सिर्फ लिखने की रस्म अदायगी नहीं करते बल्कि पूरी प्रतिबद्धता से लिखते हैं. विषय पर पूरा रीसर्च करके और मनन करके वह तर्कों की ऐसी धार तैयार करते हैं कि उनके वैचारिक विरोधी भी इसके कायल हैं (हालांकि वह इसे स्वीकार करने में थोड़ी 'सेकुलर कंजूसी' जरूर करते हैं)

सुरेशजी भगवान् महाकाल की नगरी में रहते हैं इसलिए निर्भीक हैं, ईमानदार हैं, लाजवाब लिखते हैं, राष्ट्र के लिए सोचते हैं, और किसी 'इतालवी महारानी' या 'लाल झंडे वाले देश' की मेहरबानी या इशारे पर नहीं लिखते हैं. ना ही हिन्दुस्तान को 'दारुल-हरब' बनाने को बेताब किसी 'जेहादी देश' से खैरात पाते है और ना ही धर्मान्तरण के धंधे के लिए MNC कंपनी की तर्ज पर काम करने वाले वेटिकन चरक से उन्हें 'मानव-सेवा' के लिए कोई दान मिलता है. वह सिर्फ भारत मां के लिए, उसकी जनता -जनार्दन के लिए लिखते हैं.

और इसी सचाई और स्वतन्त्र धारदार लेखनी के कारण आज सुरेशजी के ब्लॉग के हजारो की तादाद में सब्स्क्राइबर / फोलोअर हैं.  और अपंजीकृत पाठको की संख्या का तो हिसाब ही नहीं है. वह अपने ब्लॉग पर भी जबरदस्त हिट पाते हैं. खुशी की बात है कि दिन-ब-दिन उनके चाहको की संख्या बढ़ती जा रही है (जिस कारण 'जेहादी-क्रूसेडर सेकुलरो' की नींद भी हराम हो रही है!). उनकी प्रसिद्धी के यह आंकड़े हिन्दी की कई नामी वेबसाईट से भी ज्यादा हैं.

सुरेश जी कारण न केवल राष्ट्रवादी-हिन्दुत्ववादी ब्लोगरो के मन में आशा का संचार हुआ है बल्कि एक हौंसला, बेहतर लिखने की प्रेरणा भी मिली है. यूं कह सकते हैं कि ब्लॉगजगत में सुरेश चिपलूनकर अपने आप में एक संस्थान बन चुके हैं.

काफी समय से इसकी मांग थी कि, सुरेशजी ब्लोगिंग से आगे बढे और उनके नेतृत्व में एक समग्र वेबसाईट की शुरूआत की जाए. और इसी क्रम में एक पहल की जा रही है. लेकिन इसमे सबसे बड़ी समस्या है धन की. क्योंकि उन्हें सेकूलर मीडिया की तरह अन्दर-बाहर से कोई आर्थिक सहायता नहीं मिलती है. और ना ही वह ऐसी किसी सहायता से मदद पाकर अपनी कलम की धार को गिरवी रखना चाहते हैं.
मध्य प्रदेश के उज्जैन नगर के लेखक सुरेश चिपलूनकर महज दो कंप्यूटर वाला छोटा-सा सायबर कैफे चलाते है. यही उनकी आमदनी का जरिया और और यही उनकी ब्लोगिंग का औजार है. अभावो के बावजूद राष्ट्र चिंता में समय-साधन और साधना समर्पित करने वाले इस शख्स के प्रयास सफल बनाने में हम सबकी सफलता है. वह जनता के लिए लिखते हैं, अत: उनकी तरफ मदद का हाथ बढाने का जिम्मा भी आप-हम जैसे आम नागरिको को हैं. ..जो इस देश के लिए सोचते हैं, बदलाव लाने के इच्छुक हैं, सच जानने के इच्छुक हैं. कथित मुख्यधारा के सेकुलर मीडिया की कली करतूतों और एकतरफा पत्रकारिता से त्रस्त हैं. अगर हम सुरेशजी का साथ नहीं देंगे तो राष्ट्र-वैभव के इस यज्ञ में आहुती देने के लिए आगे आने की जोखिम कौन प्रतिभाशाली लेखक/पत्रकार उठाएगा...?

जो लोग सुरेशजी को पढ़ चुके हैं. उन्हें अहसास है कि उनको पढ़ने का एक अलग ही नशा है. एक अलग ही आनंद हैं. वह सेकुलरिज्म की अफीम पीलाकर सुलाए गए लोगो को झिंझोड़कर जगाते हैं. वह  सेकुलरो और उनकी राष्ट्रघाती करतूतों पर ऐसे सवाल उठाते हैं कि हम विस्मित हो जाते हैं. जिस तरह से वह सेकुलरिज्म के नाम पर होनेवाले गोरखधंधे की पोल खोलते हैं ... मन अनायास ही उन्हें 'सुरेशलीक्स' (विकीलिक्स की तर्ज पर) कहना चाहता  है.  और सबसे बड़ी बात आज देश और समाज को सुरेशजी की जरूरत है. और ऐसे राष्ट्रवादी चिन्तक को हमारी ताकत की जरूरत है.
मेरा व्यक्तिगत आग्रह है कि, सुरेश चिपलूनकर की प्रस्तावित वेबसाईट में मुक्त हस्त से योगदान दीजिये. जिनके पास पे-पाल खाता अथवा क्रेडिट कार्ड नहीं हैं, वे स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के सेविंग खाता क्रमांक 030046820585 (SURESH CHIPLUNKAR)- IFSC Code : SBIN0001309 में भारत के किसी भी कोने से राशि डाल सकते हैं. 

आप अधिक जानकारी के लिए और उनकी धारदार लेखनी का नमूना देखने उनके ब्लॉग पर पधार सकते हैं. आर्थिक योगदान संबधी किसी भी जानकारी के लिए उनसे suresh.chiplunkar @gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं. विश्वाव कीजिये आपका योगदान बेकार नहीं जाएगा. 

13 सितंबर 2010

सलमान ने कहा गलती कर दी?

मुम्बई पर जेहादी हमले पर सलमान खान की टिप्पणी को लेकर सेकुलर मीडिया खूब हल्ला मचा रहा है.


आखिर सलमान के पीछे सेकुलर मीडिया क्यों हाथ धोकर पडा है? क्या इसकी वजह सलमान का मुसलमान होना है? जी बिलकुल नहीं, इसकी असली वजह है सलमान का मुसलमान होकर भी, जेहादी मुसलमान नहीं होना है.

एक हिन्दू माँ और शिया मुस्लिम पिता  के बेटे सलमान खान दूसरे खानों (आमिर/शाहरुख) से ज्यादा सेकुलर और ईमानदार है. लेकिन उनके मन में कपटी जेहादी मानसिकता नहीं है (जो बाकी खान सितारों में कूट-कूट कर भरी हुई है). और यही बात भारत के मुस्लिमो, उनके चरण-आराधक सेकुलर नेताओं और मीडिया को नहीं सुहाती है.

सलमान के घर गणपति लाये जाते है...उनकी एक बहन अर्पिता खान गोद ली हुई है फिर भी हिन्दू है. उनके पिता सलीम खान ने कई बार कट्टर मुस्लिमो को आड़े हाथ लिया है. कुछ साल पहले मुम्बई के इसकों मंदिर ने माहिम दरगाह के बाहर बैठने वाले गरीब मुस्लिमो को हर रोज भोजन देने का प्रस्ताव दिया था. लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथियों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था. कि हिन्दू भगवान के मंदिर से आने वाले भोजन को खाने से बेहतर है भूखा मर जाना. इस मुस्लिम मानसिकता का सलीम खान ने पूरजोर विरोध किया था. वह अपने पूर्ववर्ती जोडीदार जावेद अख्तर की तरह सेकुलरिज्म का छली नकाब ओढ़कर, इस्लाम की गलतिया छिपाकर हिन्दुओ को नहीं कोसते है, बल्कि मुस्लिम कट्टरपंथ की आलोचना करते हैं.

और हमारा सेकुलर गिरोह (मीडिया, नेता, मानवाधिकार) जिस इस्लाम को सिजदा करता है वह कट्टर सुन्नी वहाबी तबका है. जाहिर है इसीलिये मीडिया को शिया सलमान खान से खुन्नस होनी ही है.

दूसरी तरफ गुजरात में मुस्लिम दंगाईयो की पैरवी करने वाले और नरेन्द्र मोदी को गाली देने वाले आमिर खान और पाकिस्तानी खिलाडियों की पैरवी करने वाले और खुद को इस्लाम का दूत बताने वाले, हिन्दू पार्टी शिव सेना की आलोचना करनेवाले शाहरुख खान कट्टर मुस्लिम हैं और सिर्फ अपने धर्म के लोगो की पैरवी करते है. इसलिए वह सेकुलर है. कोंग्रेस और मीडिया के दुलारे हैं.

यही गलती है सलमान की. .. की वह मुसलमान होकर भी कट्टर और अंधभक्त नहीं है, ईमानदारी से बात रखते है. दूसरे खानों की तरह कपट नहीं रखते है. सेकुलर दोगलापन नहीं है. उनकी मानसिकता भी जेहादी नहीं है.

और हमारे मीडिया को तो जेहादी, भारत-विरोधी, हिन्दू विरोधी मुसलमान ही प्यारे है. इसका सबूत आपको फिरोज खान के पाकिस्तान प्रवास वाले प्रकरण से भी मिल जाएगा.

पाकिस्तान में एक कार्यक्रम के दौरान किसी पाकिस्तानी ने भारत के खिलाफ अनाप-शनाप बका था. उस समय वहा फिरोज खान सहित हमारे महान सेकुलर महेश भट्ट और जावेद अख्तर भी थे. लेकिन किसी ने विरोध नहीं किया. सिर्फ फिरोज खान ने उस पाकिस्तानी को खरी-खरी सुना दी कि 'हमारे भारतीय मुसलमानों की चिंता छोड़ो और पाकिस्तानी मुसलमानों की परवाह करो'.

इसके बाद पाकिस्तानी तो छोड़ो, भारतीय मीडिया ने भी फिरोज खान को विलेन बना दिया. और शराबी, नशेड़ी जैसे खिताब दे डाले.

अब आप सोच सकते है कि भारत में सेकुलर पत्रकारिता और नेतागिरी के क्या मायने है.

19 फ़रवरी 2010

'खान' में नहीं है जान !


जनमानस में इस्लाम के जेहादी स्वरूप को भुलाने के लिए  'छवि सुधारक अभियान' के तहत बनाई गयी फिल्म माय नेम इज खान अब चारो खाने चित्त होती नजर आ रही है. 'खान' भयभीत-पोषित मीडिया चाहे कुछ भी दावे कर ले लेकिन जनता ने लगभग इस फिल्म को ठुकरा दिया है और इसका हश्र सैफ अली खान अभिनीत कुर्बान जैसी होने की पूरी उम्मीद है.

शिव सेना के विरोध और मीडिया द्वारा खान-गुणगान के कारण शुरूआत में भले ही इस फिल्म ने शाहरुख के अंधभक्तो की भीड़ जुटाई हो लेकिन  अब यह खेल लंबा नहीं चल रहा है. क्योंकि लोग झांसे में आकर एक बार फिल्म देखने भले ही चले जाए, बार-बार उन्हें बेवकूफ बनाना मुश्किल है. शायद लोगो की समझ में भी आ गया होगा की माय इज इज खान पर १०-२० रुपये खर्च करके उसे पायरेटेड सीडी पर देखना ही मुनासिब है. कोंग्रेस और मेडम सोनिया के करीबी शाहरुख खान की लाज बचाने के लिए अब एक ही उपाय है कि भोंदू युवराज की युवक कोंग्रेस या एन एस यु आई टिकट खरीदकर लोगो में मुफ्त बांटे.
 
पीवीआर सिनेमा में थियेटर की सीट-भराई ९०% गिरकर सोमवार को ५०% हो गयी. वही स्पाइस सिनेमा का कहना है कि, .. खान की टिकट बिक्री में बुधवार को २०% और गुरूवार को ३०% गिरावट आई.

बिना मनोरंजक गुणों के सिर्फ प्रोपेगेंडा के लिए बनाई जाने वाली फिल्मो का हश्र ऐसा ही होता है.
 
विस्तार से पढने के लिए वन इंडिया पोर्टल पर छपी खबर पर गौर करें. लिंक दिया जा रहा है...

31 जनवरी 2010

बोर्डर पार करने की सजा और मजा !




कहाँ बोर्डर पार करे और कहाँ  नहीं?

अगर आप गैर-कानूनी ढंग से उत्तरी कोरिया का बोर्डर पार करे तो १२ साल की सश्रम कारावास सजा मिलेगी.
अगर आप गैर-कानूनी ढंग से इरानी बोर्डर पार करेंगे आपको अनिश्चित अवधि तक जेल में बंद कर दिया जाएगा.
अगर आप गैर-कानूनी ढंग से अफगान बोर्डर पार करेंगे तो आपको गोली मार दी जाएगी.
अगर आप गैर-कानूनी ढंग से सउदी अरब बोर्डर पार करेंगे तो आपको जेल में ड़ाल दिया जाएगा.
अगर आप गैर-कानूनी ढंग से चीनी बोर्डर पार करेंगे तो आप फिर कभी नजर नहीं आएँगे.
अगर आप गैर-कानूनी ढंग से वेनेजुएला बोर्डर पार करेंगे तो आपको जासूस होने का चस्पा लगा दिया जाएगा, और फिर क्या होगा आपको मालुम है.
अगर आप गैर-कानूनी ढंग से क्यूबा का बोर्डर पार करेंगे तो आपको राजनीतिक शत्रु मानकर जेल में सड़ने के लिए ड़ाल दिया जाएगा.
अगर आप गैर-कानूनी ढंग से ब्रिटेन के बोर्डर को पार करेंगे तो आपको गिरफ्तार करके, मुकदमा चलाया जाएगा और फिर तडीपार किया जाएगा.

लेकिन..
अगर आप पाकिस्तानी या बांग्लादेशी हो और गैर-कानूनी ढंग से भारतीय सीमा में घुसे तो आपको यह नजराने मिलेंगे:
  • राशन कार्ड
  • पासपोर्ट (एक या अधिक)
  • हज सबसिडी
  • ड्राइविंग लायसेंस
  • वोटर परिचय-पत्र
  • नौकरी में आरक्षण
  • बैंक लोन में आरक्षण
  • अल्पसंख्यक (वोट बैंक) होने के नाते विशेष सुविधाएं
  • क्रेडिट कार्ड
  • रियायती किराया या घर खरीदने के लिए लोन
  • मुफ्त शिक्षा
  • मुफ्त चिकित्सा सुविधाएं.
  • आपकी चाकरी में सेकुलर मीडिया 
  • नई दिल्ली में आपकी पैरवी करने वाले वकील, मानवाधिकार वादी और सेलिब्रिटी.
  • सेकुलरिज्म पर बड़ी-बड़ी बाते करने का हक, जो आपको अपने मुल्क में कभी ना मिला.
  • और हाँ सबसे बड़ा हथियार---वोट डालने का अधिकार!
यानी जिस घुसपैठ के लिए दूसरे देशो में आपको कड़ी सजा मिलती है, उसी घुसपैठ के लिए भारत में सेकुलर नेता इनाम-इकराम की बरसात करते हैं!

भारत की सेकुलर राजनीति की जय हो!!

05 नवंबर 2009

मेरा सेकुलर महान!

तसलीमा को देश निकाला,

हुसैन को मिले सम्मान.

हिन्दू द्वेष को मिलता है

इस देश में सेकुलर नाम.

कभी नंगे पैर घुमकर

कभी देवताओं के नंगे चित्र

अपने मोल बढाने की

ये प्रथा चली विचित्र.

वोट के खातिर घुटने टेके

विकृत के सामने सरकार.

सोया हिन्दू कब करेगा

इस जुल्म का प्रतिकार.

करे प्रतिकार तो मीडिया भौंके,

भौंके सारा जहां,

इसी को कहते हैं भारत का

मेरा सेकुलर महान.

--


29 जुलाई 2009

सेकुलर सा'ब, तो भ्रष्टाचार माफ़!

हमारे देश में सेकुलरिज्म के नाम पर कुच्छ भी सहन किया जा सकता है. आप चाहे जनता पर महंगाई लादो या भ्रष्टाचार करो सब कुछ माफ़ है, बशर्ते आप सेकुलर हो. सेकुलरवाद का नारा देकर ही लालूजी ने १५ साल तक बिहार पर राज करते हुए जनता और प्रदेश का जो कबाडा किया वह सब जानते हैं. कभी नालंदा, तक्षशिला की भूमि के रूप में ख्यात रहा और भारत का मस्तक कहा जानेवाला बिहार देश के पिछडे प्रदेशो में गिना जाने लगा. विकास और जनहित समेत ईमानदारी और सुशासन जाए भाड़ में, हम तो सेकुलर हैं. और प्रजा पर राज करने के लिए सिर्फ सेकुलर होना ही काफी है. कोंग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री आनंद शर्मा की करतूत ही देख लीजिए. बी एम् डब्ल्यू मामले में एक वकील होने के नाते उन्होंने क्या किया यह सबके सामने है. ज्यादा जानकारी के लिए दैनिक जागरण में छपी पूरी खबर हूँ-ब-हूँ पेश है. अमां अब क्या कहें, आनंद शर्मा ठहरे महान सेकुलर दल के महान सेकुलर नेता... सो उनका गुनाह देश की जनता को माफ़ करना ही होगा. आइए दैनिक जागरण में छपी खबर पर गौर फरमाते हैं:

कांग्रेस ने आनंद से पल्ला झाड़ा

नई दिल्ली। कांग्रेस पार्टी ने अदालत की अवमानना के मामले में दोषी करार दिए गए बीएमडब्ल्यू मामले के अभियुक्त संजीव नंदा के वकील आर के आनंद से खुद को दूर कर लिया है। आनंद ने कांग्रेस पार्टी के टिकट पर 2004 में लोकसभा का चुनाव लड़ा था।

पार्टी प्रवक्ता शकील अहमद ने कहा कि यह आनंद और न्यायालय के बीच का मामला है। हमें इस मामले के संबंध में कोई राजनीतिक बयान नहीं देना है।

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखने का निर्णय दिया, जिसमें आनंद को अदालत की अवमानना का दोषी करार दिया गया था।

इससे पहले, हाईकोर्ट ने एक समाचार चैनल के स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर आनंद को दोषी ठकराया था। स्टिंग में दिखाया गया था कि बीएमडब्लयू मामले के अभियुक्त संजीव नंदा के वकील आनंद इस मामले में सरकारी वकील आई. क्यू. खान के साथ मिलकर नंदा को बचाने के लिए प्रयास कर रहे थे।

विधि जगत ने भी की सराहना:----

बीएमडब्ल्यू मामले में अदालत की अवमानना करने वाले जानेमाने वकील आर के आनंद की सजा बरकरार रखे जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की विधि जगत में यह कहते हुए सराहना की गई कि यह निर्णय वकालत के पेशे के लिए अच्छा है और इससे तंत्र को साफ सुथरा बनाने में मदद मिलेगी।

जानेमाने वकील राम जेठमलानी और के.टी.एस. तुलसी ने इस फैसले का यह कहते हुए स्वागत किया कि इससे पेशे की 'गरिमा' बहाल करने में मदद मिलेगी। बीएमडब्ल्यू 'हिट एंड रन' मामले में संजीव नंदा का बचाव करने वाले जेठमलानी ने कहा, 'मैं फैसले से खुश हूं लेकिन चीजें अभी भी छिपी हुई हैं और किसी दिन उन्हें भी उजागर होना होगा। यह हमारे लिए और विधि तंत्र के लिए अच्छा है। वह [आनंद] सजा का हकदार है क्योंकि उसने अपने मुवक्किल की कीमत पर रुपया कमाने की कोशिश की।

के.टी.एस. तुलसी ने कहा कि सत्य की विजय हुई। टेप की रिकॉर्डिंग की विश्वसनीयता पर कभी कोई संदेह नहीं था। यह बेहद दुख की बात है कि अंतिम निर्णय आने में लंबा समय लगा। लेकिन मुझे खुशी है कि सुप्रीम कोर्ट ने वकालत के पेशे के महत्व को दोहराया और यह समाज एवं अदालत का कर्तव्य है। वकीलों के लिए आत्मनिरीक्षण की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि हम वकीलों को यह याद रखने की जरूरत है कि वकालत का पेशा कोई व्यापार या व्यवसाय नहीं बल्कि एक नोबेल पेशा है।

अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि आनंद पर उम्रभर के लिए प्रैक्टिस करने पर रोक लगाई जानी चाहिए क्योंकि उन्होंने जो किया, वह 'पेशागत मूलभूत दुराचरण' है। उन्होंने कहा कि यह एक अलग मामला नहीं है। कई मामलों में गवाहों को प्रभावित किया गया और बार काउंसिल उन प्रभावशाली वकीलों के खिलाफ कोई कार्रवाई करने में विफल रही। भूल करने वाले वकीलों के लिए यह मामला एक नजीर पेश करेगा। भूषण ने कहा कि बार काउंसिल की विफलता को देखते हुए वकीलों के लिए कोई आंतरिक नियामक निकाय होना चाहिए.

(Source:दैनिक जागरण) Jul 29, 05:23 pm


12 जुलाई 2009

एक और 'सेकुलर' बजट

कोंग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार ने एक बार फिर अपने 'सेकुलर' होने का सबूत देते हुए बजट को वोट बैंक की राजनीति का हथियार बना दिया है. सरकार ने अपने बजट में तथाकथित अल्पसंख्यकों के तथाकथित कल्याण के लिए १७०० करोड़ रुपये की भारी रकम बाँटीं है वहीं हाल ही में सेकुलर बनी ममता बनर्जी ने रेलवे बजट में भी अल्पसंख्यकों को कई सौगाते दी हैं. यही नहीं मदरसों को भी काफी खैरात बांटकर उन्हें 'अपनी मर्जी से पढाने की छूट' भी बख्शीस दी है. यानी देश के प्रति किसी जिम्मेदारी के बिना ही 'माल-ए-मुफ्त' खाने की आजादी. वह भी किसी सोनिया या मनमोहन के बटुए से नहीं बल्कि देश के करोडो करदाताओं की जेब से!

इस बजट में एक और मजे की बात यह है की अल्पसंख्यक कल्याण के नाम पर इस सरकार ने सिर्फ मुसलमानों के कल्याण में ही सरकार की तत्परता दिखती है. बाकी बचे अल्पसंख्यक समुदायों जैसे जैन, सिक्ख, बौद्ध, पारसी, ईसाई आदि का बजट में जिक्र ही नहीं है. आखिर धर्म के आधार परा रेवडियाँ बांटकर जनता की गाढ़ी कमाई से अपना वोट बैंक मजबूत करने का सिलसिला किस तरह का सेकुलरिज्म है? इसका जवाब न तो कोंग्रेस के पास है, ना ही सेकुलरवाद पर अपनी नेतागिरी चमकाने वाले मुलायम, अमर, पासवान, मायावती, लालू और कम्युनिस्टों के पास.खैर देश की अर्थव्यवस्था और महंगाई जाए भाड़ में, हमें तो अपना वोट बैंक मजबूत बनाना है. जय हो सेकुलरिज्म!
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आइये इस विषय पर हिन्दी के प्रमुख अखबार 'दैनिक जागरण' में छपी News पर गौर फरमाते हैं:

अल्पसंख्यकों पर और बरसेगी रहमत

(July 06, 2009 / 07:53 pm) नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]

अल्पसंख्यकों पर दरियादिली को लेकर विरोधी पार्टियां सरकार पर भले ही बहुतेरे सवाल उठाती रही हों, लेकिन वह उनकी तालीम व तरक्की में कोई कोताही नहीं करेगी। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के बजट में 74 प्रतिशत का इजाफा करके उसने यह साफ कर दिया है। इतना ही नहीं, अल्पसंख्यक बहुल जिलों में पानी, बिजली, सड़क, शिक्षा, बैंक आदि [मल्टी सेक्टोरल योजना] की व्यवस्था पर भी सरकार खास ध्यान देगी।

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने सोमवार को लोकसभा में चालू वित्तीय वर्ष [2009-10] के लिए अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के लिए 1740 करोड़ रुपये के बजट का ऐलान किया। यह मंत्रालय के पिछले [2008-09 में 1000 करोड़ रुपये] बजट से 74 प्रतिशत अधिक है। यह धनराशि खास तौर से नौ योजनाओं पर खर्च की जाएगी। ज्यादा ध्यान 20 प्रतिशत से अधिक अल्पसंख्यक आबादी वाले जिलों में मल्टी सेक्टोरल योजना के कार्यों पर दिया जाएगा। अल्पसंख्यक छात्रों की तालीम के मद्देनजर पूर्व मैट्रिक छात्रवृत्ति, मैट्रिकोत्तर छात्रवृत्ति के साथ ही उच्च स्तर पर व्यावसायिक व तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले छात्रों के लिए योग्यता सह-युक्ति छात्रवृत्ति [मेरिट कम मींस] भी प्राथमिकता में शामिल हैं।

अल्पसंख्यकों पर सरकार की गंभीरता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि कुल बजट में से 990 करोड़ रुपये सिर्फ मल्टी सेक्टोरल योजना, मौलाना आजाद फाउंडेशन को अनुदान, पूर्व मैट्रिक व मैट्रिकोत्तर छात्रवृत्तियां और एनएमडीएफसी पर खर्च किए जाएंगे। पश्चिम बंगाल व केरल में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कैंपस खोले जाने के के लिए 25-25 करोड़ रुपये का अलग से आवंटन कर भी सरकार ने अल्पसंख्यकों की तालीम पर अपनी गंभीरता का संदेश देने की भी कोशिश की है।

क्या होगा असर

अल्पसंख्यकों में कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण, मौलाना आजाद फाउंडेशन को सहायता अनुदान, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम [एनएमडीएफसी] को इक्विटी और विकास योजनाओं का मूल्याकंन भी अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय का बजट बढ़ाए जाने के कारण हैं। अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों के लिए राष्ट्रीय फेलोशिप और राज्य वक्फ बोर्डों के रिकार्ड के कंप्यूटरीकरण के लिए केंद्रीय वक्फ बोर्ड को भी इसी बजट से धन दिया जाएगा। इससे जहां मुस्लिम इलाकों में विकास होगा, वहीं अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों में पढ़ाई और पेशेवर हुनर का स्तर भी ऊपर उठ सकेगा।
(Source: दैनिक जागरण)