आजाद हिन्दुस्तान में जिन शब्दों ने सबसे ज्यादा गुमराह किया है, उनमें से एक है “सेकुलर”. इसी के सही मायने समझने-समझाने और भारत की सेकुलर राजनीति का पर्दाफाश करने के साथ ही मुख्यधारा के मीडिया, विचारकों की दुनिया में घुसे तथाकथित सेकुलर-वादियों की खरपतवार के पाखंड को उजागर करना ही हमारा लक्ष्य है. यह एक गैर-राजनीतिक मंच है. और देश में सर्वधर्म समानता, सदभाव, और राष्ट्र की अस्मिता के रक्षण के लिए समर्पित इस अभियान में आपके सहयोग की अपेक्षा है. वंदेमातरम! जयहिंद !
23 मार्च 2010
ये बाबा ! ना बाबा, ना !
गौर करने लायक बात ये है कि, इन बाबाओ में अधिकाँश मुस्लिम हैं. लेकिन अपने विज्ञापनों में पूज्य साईं बाबा का फोटो और ॐ जैसे हिन्दू प्रतीक भी लगाते हैं (शायद शर्म-निरपेक्षता की सबसे बड़ी मिसाल यही बाकी है).
मजे की बात है अब तक किसी भी प्रगतिशील/अंधश्रद्धा निर्मूलन संगठन/ शर्म-निरपेक्ष चैनल /पत्रकार ने इनकी खबर नहीं ली ना ही इसके खिलाफ किसी ने आवाज़ उठाई. कोर्ट ने भी इनके खिलाफ संज्ञान नहीं लिया.
और ना ही यह सुनने में आया कि लोकल रेलवे में अनाधिकृत रूप से और गुमराह करने वाले विज्ञापन लगाने के लिए रेलवे ने कभी कोई कार्रवाई की हो!! जबकि इनका पता और फोन नंबर भी विज्ञापनों में दिया जाता है. और भोली-भाली जनता को ठगने का यह धंधा खुले आम चलता है.
इससे भी ज्यादा मजे की बात ये है कि सेकुलरो की सरपरस्ती में मुल्ला हमेशा वन्देमातरम गाने, नसबंदी कराने, हिन्दू त्यौहार मनाने के खिलाफ बार-बार फतवा जारी करने को आतुर रहते हैं. लेकिन हिन्दू प्रतीकों का इस्तेमाल करके प्रजा को मूर्ख बनाकर गाढी कमाई करनेवाले इन बाबाओं के खिलाफ किसी भी मुल्ले ने फतवा नहीं निकाला.
बात-बेबात पर हिन्दू संतो को आरोपों के आधार पर ही बदनाम करने को बेताब रहने वाले मीडिया की इस विषय में खामोशी हैरत अंगेज है.
शायद सेकुलर मीडिया अपनी नपुंसकता का इलाज करने के लिए इन बाबाओं के पास जाता हो??
16 मार्च 2010
मीडिया को चर्च के पाप नहीं दिखते !
19 फ़रवरी 2010
'खान' में नहीं है जान !
जनमानस में इस्लाम के जेहादी स्वरूप को भुलाने के लिए 'छवि सुधारक अभियान' के तहत बनाई गयी फिल्म माय नेम इज खान अब चारो खाने चित्त होती नजर आ रही है. 'खान' भयभीत-पोषित मीडिया चाहे कुछ भी दावे कर ले लेकिन जनता ने लगभग इस फिल्म को ठुकरा दिया है और इसका हश्र सैफ अली खान अभिनीत कुर्बान जैसी होने की पूरी उम्मीद है. शिव सेना के विरोध और मीडिया द्वारा खान-गुणगान के कारण शुरूआत में भले ही इस फिल्म ने शाहरुख के अंधभक्तो की भीड़ जुटाई हो लेकिन अब यह खेल लंबा नहीं चल रहा है. क्योंकि लोग झांसे में आकर एक बार फिल्म देखने भले ही चले जाए, बार-बार उन्हें बेवकूफ बनाना मुश्किल है. शायद लोगो की समझ में भी आ गया होगा की माय इज इज खान पर १०-२० रुपये खर्च करके उसे पायरेटेड सीडी पर देखना ही मुनासिब है. कोंग्रेस और मेडम सोनिया के करीबी शाहरुख खान की लाज बचाने के लिए अब एक ही उपाय है कि भोंदू युवराज की युवक कोंग्रेस या एन एस यु आई टिकट खरीदकर लोगो में मुफ्त बांटे. पीवीआर सिनेमा में थियेटर की सीट-भराई ९०% गिरकर सोमवार को ५०% हो गयी. वही स्पाइस सिनेमा का कहना है कि, .. खान की टिकट बिक्री में बुधवार को २०% और गुरूवार को ३०% गिरावट आई. बिना मनोरंजक गुणों के सिर्फ प्रोपेगेंडा के लिए बनाई जाने वाली फिल्मो का हश्र ऐसा ही होता है. विस्तार से पढने के लिए वन इंडिया पोर्टल पर छपी खबर पर गौर करें. लिंक दिया जा रहा है... |
13 फ़रवरी 2010
मेरा मीडिया महान: युवराज के बाद अब खान का यशोगान!
05 नवंबर 2009
मेरा सेकुलर महान!
तसलीमा को देश निकाला,
हुसैन को मिले सम्मान.
हिन्दू द्वेष को मिलता है
इस देश में सेकुलर नाम.
कभी नंगे पैर घुमकर
कभी देवताओं के नंगे चित्र
अपने मोल बढाने की
ये प्रथा चली विचित्र.
वोट के खातिर घुटने टेके
विकृत के सामने सरकार.
सोया हिन्दू कब करेगा
इस जुल्म का प्रतिकार.
करे प्रतिकार तो मीडिया भौंके,
भौंके सारा जहां,
इसी को कहते हैं भारत का
मेरा सेकुलर महान.
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