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15 नवंबर 2012

बाला साहब के प्रति उत्तर भारतीयों का विषवमन नाहक!

बाला साहेब ठाकरे की बीमारी की खबर के साथ ही हमारे कुछ जागरुक उत्तर भारतीय मसीहाओ ने बाला साहब को कोसना और अनर्गल लिखना शुरू कर दिया है। इसमे से से अधिकाँश लोग हिन्दू समाज से हैं और जो सेकुलर नेताओं व मीडिया द्वारा दिग्भ्रमित हैं।
बात जनवरी 2010 की है। मुम्बई के अंधेरी पूर्व में साकीनाका इलाके में एक शिवप्रकाश दुबे नामक उत्तर भारतीय के बेटे प्रवेश दुबे के अपनी कुलदेवी माता विन्ध्य वासिनी की मन्नत के लिए रखे गए बाल उसकी स्कूल के ईसाई फादर ने जबरन काट दिए।

इस इलाके में बड़े-बड़े उत्तर भारतीय नेता है - कोंग्रेसी मंत्री नसीम खान यहाँ से एमेले हैं, बगल में कुर्ला से कृपाशंकर सिंह एमेले हैं। संजय निरुपम का ये कार्य क्षेत्र है। लेकिन किसी ने दुबे जी को सपोर्ट नहीं किया नसीम खान का भाई तो फादर का रहनुमा बनाकर दुबे जी को धमकाने लगा कि हल्ला मत करो वरना स्कूल से निकाल देंगे।  कोंग्रेस सरकार के दबाव में पुलिस भी स्कूल के फादर के पक्ष में खडी थी और प्राथमिकी दर्ज करने के लिए मना कर दिया।

तब बजरंग दल मुम्बई के प्रमुख श्री उमेश राणे अपने 100 समर्थको और 50 शिवसैनिक (सभी महाराष्ट्रीयन) स्कूल में गए और फादर की भद बिगाड़ी। और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। मजे की बात है एक उत्तर भारतीय पर जुल्म हुआ तो उसके  हक़ में लड़नेवाले सभी महाराष्ट्रीयन थे।

दूसरी तरह उत्तर भारतीयों के सारे मसीहा- संजय निरुपम, कृपाशंकर, नसीम खान, अबू आजमी आदि बिल में जा घुसे थे।

यह खबर अंगरेजी अखबार मुम्बई मिरर और डीएनए में भी छपी थी। मिम्बी मिरर का लिंक यहाँ दे रहा हूँ, जिसे अपनी पुष्टि के लिए आप पढ़ सकते हैं। टीवी चैनलों पे भी उमेश राने आये थे।
ऐसे असंख्य वाकये हैं। फिर भी हम उत्तर भारतीय मराठी मानूष के साथ प्रेम से नहीं रह पाए तो गलती हमारी है। किसी राज या बालासाहेब ठाकरे की नहीं।
दरअसल हमें ये सत्य स्वीकार करना होगा कि मुम्बई के अधिकाँश अपराधो में उत्तर भारतीय मुस्लिम (खासकर वहाबी) शामिल होते हैं। लेकिन ठीकरा फूटता है सभी उत्तर भारतीयों पर। ऐसे में लालू, नीतीश, अबू, अमर सिंह, रौल विंची और मुलायम, कृपाशंकर, निरुपम के बयान आग में घी डालने का काम करते हैं।
और मुम्बई में यूपी के यादव के सामने मराठी जाधव, और पांडे के सामने देशपांडे खडा हो जाता है। जब की पता करो तो दोनों के रगों में एक ही डीएनए होगा!!
सोनिया के खिलाफ राष्ट्रवाद का नारा लगाकर राष्ट्रवादी कोंग्रेस पार्टी बनाने वाले शरद पवार का 'राष्ट्रवाद' से कितना वास्ता है?
ठीक वैसे ही वक्त के साथ मराठावाद का नारा भी हवा के साथ गुम होने वाला है। हाँ हमें मुम्बई में अपनी विश्वसनीयता कायम करनी होगी।
दूसरी तरफ हमें समझना होगा कि ---हमारे वोटो पे जितने वाले गोवा में कोंग्रेस का मुख्यमंत्री दिगंबर कामत उत्तर भारतीयों को भिखारी कहता है। महाराष्ट्र का शिक्षा मंत्री सुरेश शेट्टी हमें सिर्फ ठेला वाला, केला वाला कहता है तो कोई तकलीफ नहीं होती तो ठाकरे से क्यों इतनी खुन्नस?? क्यों हम निरुपम, अबू आजमी कृपाशंकर, लालू अमर सिंह और सेकुलर मीडिया जैसे दलालों के बहकावे में आकर मुम्बई में अपनी विश्वसनीयता गिराने पे तुले हैं।
मुम्बई दंगो में सरे आम नंगा नाच करनेवाले और दाउद इब्राहिम के करीबी अबू आजमी आये दिन मुम्बई में पोस्टर चिपकाता है कि -''मुम्बई हमारी आपकी नहीं किसी के बाप की!'' तो किस सद्भाव की अपेक्षा रखे? किसी जमाने में मुम्बई की गलियों में झोला लेकर काम मांगते फिरते उत्तर भारतीय संजय निरुपम को बाला साहब ने सामना का सम्पादक बनाकर राज्य सभा में भेजा. लेकिन बदले में निरुपम ने बाला साहेब को धोखा दिया। इस तरह हम कैसी विश्वसनीयता कायम करना चाहते हैं??

याद रखिये बाला साहब न होते तो मुम्बई की हालत भी कश्मीर, केरल, असम और मुल्लायम राज जैसी होती।

http://www.mumbaimirror.com/article/2/2010010620100106015843840aee07258/Principal-snips-off-student%E2%80%99s-hair-parents-lodge-FIR.html?pageno=1

13 फ़रवरी 2010

मेरा मीडिया महान: युवराज के बाद अब खान का यशोगान!


आखिर 'माय नेम इज खान' को लेकर शाहरुख बनाम शिवसेना की जंग में शाहरुख के पक्ष में माहौल बनाकर मीडिया ने शाहरुख को 'विजेता' घोषित कर ही दिया है. और शाहरुख को विजेता घोषित करने में मीडिया को अपने सेकुलर आका कोंग्रेस को भी गरियाना पडा...कि सरकार ने वादा करके भी फिल्म की रिलीज में शिवसेना की अड़चन को दूर नहीं किया. जैसेकि सरकार के पास फिल्म रिलीज कराने के अलावा कोई और काम ही नहीं हो.

हकीकत ये है कि, जब सेकुलर निजाम ने अपने सारे सिपाही शाहरुख के पोस्टरों की रखवाली में तैनात किए हो, जब मीडिया वास्तविक मुद्दे ताक में रखकर शाहरुख के महिमा मंडन में लग जाए तो शाहरुख क्या किसी की भी फिल्म की औकात बढ़ जायेगी. मुम्बई में शिवरात्री पर हाल ये था की बाबुलनाथ और पवई शिवालयो समेत प्रमुख मंदिरों में (जहां लाखो भक्त दर्शन हेतु आते हैं) पर्याप्त सुरक्षा इन्तेजाम नहीं था, क्योकि अधिकाँश पुलिस बल उस शाहरुख खान की फिल्म रिलीज करने के लिए तैनात था, जो खुद को इस्लामिक आइकन मानता है और दुबई में जा बैठा है. जो २६/११ मुम्बई समेत हिन्दुस्तान में हुए तमाम आंतकी हमलो के केंद्र पाकिस्तान की पैरवी करता है. हालांकि मीडिया में इतनी हिम्मत कहाँ कि, शाहरुख से इस पाकिस्तान-प्रेमी बयान के बारे में पूछे. बल्कि मीडिया ने भरपूर कोशिश की कि यह विवाद व्यवस्था बनाम-फिल्म उद्योग बन जाए, क्षेत्रवाद बनाम-राष्ट्रवाद बन जाए, हिन्दू-बनाम मुस्लिम बन जाए, लेकिन भारत-प्रेमी और भारत-विरोधी न बन पाए. मीडिया या जमात -ए-सेकुलर ने कभी भी शाहरुख या करण जैसे लोगो से यह नहीं पूछा कि 'माय नेम इज खान' ही क्यों? 'माय नेम इज कश्मीरी पंडित' क्यों नहीं? 'माय नेम इज पाकिस्तानी हिन्दू' क्यों नहीं? 'माय नेम इज तसलीमा' क्यों नहीं? आखिर वह अपनी फिल्मो के माध्यम से किस तरह के अल्पसंख्यकवाद को स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं? और छवि-तोड़क फिल्मे बनाने के लिए इतने उतारू क्यों हैं?

शाहरुख़ खान की असली सेकुलरी तो तब दिखती जब वह एक मुस्लिम होने के बावजूद कश्मीरी हिन्दूओ पर हुए जुल्मो-सितम पर फिल्म बनाकर उसे देश-दुनिया के सामने लाते. और जेहादी दशहतगर्दी को लानत-मलालत करते और इस्लाम के सच्चे बन्दे होने के नाते इस्लामी-आंतक के खिलाफ खुलकर बोलते.  खैर अब तक की उनकी बातो को देखकर नहीं लगता कि वह कोई ऐसी हिम्मत करे. क्योंकि ऐसा होने पर उनके खिलाफ फ़तवो की दूकान खुल जायेगी या दुबई से बड़े 'भाई' का कॉल आ जाएगा. और अगर उनको भी धता बताकर एक असली खान-पठान का दम-ख़म दिखाकर कश्मीरी/पाकिस्तानी/बांग्लादेशी या मलेशियाई हिन्दू की पीडाओ पर कोई फिल्म बनाने की कोशिश भी करे तो हमारे सेकुलर नेता और मीडिया उन्हें बनाने नहीं देगी.

अब खबर ये है कि, कोंग्रेसी नेता शाहरुख खान के टिकट थोक के भाव खरीदकर लोगो को मुफ्त बाँट रहे है. इसका भी उनको फायदा मिलने ही वाला है. क्योंकि इस फिल्म में भी उसी 'अल्पसंख्यकवाद' को स्थापित और महिमा मंडित करने का प्रयास किया गया है, जो कोंग्रेस के लिए वोट बैंक की जमीन तैयार करता है.हो सकता है कि आगामी दिनों में कोंग्रेस सेवादल या एन एस यु आई के कार्यकर्ता देश के सिनेमाघरों के बाहर ..खान के टिकट ब्लैक में बेचते नजर आएं.

इस सारे घटनाक्रम से कई सवाल उपजे हैं. क्या भारत की जनता के पैसो से हिट -सुपरहिट होने वाले कलाकार की अपनी पाकिस्तानी भाइयो की पैरवी सही है? क्या मीडिया फिल्म या व्यक्ति विशेष के लिए ही भोंपू बनाकर महंगाई, आतंरिक सुरक्षा जैसे मुद्दों को दबा दे यही पत्रकारिता है. देखना ये है कि पाकिस्तान-परस्त शाहरुख खान को हिन्दुस्तान-परस्त शिवसेना के सामने भारी दिखाने का यह खेल कितने दिन टिकता है? खैर इस सारे प्रकरण में मीडिया और शाहरुख खान ने अपनी जात दिखा दी है, जिसका असर उनकी आगामी फिल्मो पर भी पड़ा सकता है. 

सटाक: भाई अनिल पुसदकर ने अपने ब्लॉग पर सौ टके की बात कही है: 'अगर मीडिया महंगाई कम करने के लिए इतनी मेहनत से सरकार पर दबाव डालती तो एक शाहरुख खान क्या सारे हिन्दुस्तान की प्रजा को राहत मिलती.'

23 नवंबर 2009

२६/११ की बरसी और अजमल की बिरयानी !


एक ओर सारा देश २६/११ के मुम्बई पर हुए हमले की बरसी मना रहा है, वही दूसरी ओर अजमल कसाब को 'अच्छी' बिरयानी चाहिए. मुम्बई पर हुए हमले के दौरान पकडे गए और कई मासूम लोगों की बेरहम ह्त्या करने वाले अजमल कसाब सरकारी खर्चे पर एश करते हुए आए दिन नए-नए शफूगे छोड़कर कोर्ट और देश- दुनिया को गुमराह कर रहा है. एक अफजल गुरु सजायाप्ता होने के बावजूद  दिल्ली में सरकारी जमाई बनकर बिरयानी खा रहा है तो दूसरा मुम्बई में अच्छी बिरयानी के लिए धौंस जमा रहा है. और सरकार व पुलिस को टरका रहा है. सेकुलर राजनीति के वोटो के लालच में आतंकियों की अगवानी की प्रवृत्ति के चलते उसके दुस्साहस की बानगी देखिये...यह खबर छपी है दैनिक जागरण में.

अजमल का आरोप, मेरे खाने में ड्रग्स 

Nov 18, 12:00 am

मुंबई। पाकिस्तानी आतंकी मुहम्मद अजमल अमीर इमान उर्फ अजमल कसाब ने आतंकवाद निरोधी अदालत से शिकायत की है कि उसे जेल में खाने में ड्रग्स मिलाकर दिया जा रहा है। चिकित्सा विशेषज्ञों ने गत वर्ष 26 नवंबर के आतंकी हमले के दौरान जिंदा गिरफ्तार एकमात्र आतंकी अजमल के इस आरोप को खारिज कर दिया है।
विशेष लोक अभियोजक उज्ज्वल निकम ने बुधवार को यहां बताया कि अजमल ने कुछ दिन पहले न्यायाधीश एम.एल. तहलियानी से शिकायत की थी कि उसे जो भोजन दिया जा रहा है, उसमें ड्रग्स मिला होता है। उसने अपने आरोप को साबित करने के लिए खाने के लिए मिले चावल के नमूने भी अदालत को दिए थे।
उसकी शिकायत का संज्ञान लेते हुए अदालत ने उस नमूने को चिकित्सा विशेषज्ञों की राय जानने के लिए भेजा था। निकम ने बताया कि विशेषज्ञों ने चावल में कोई ड्रग्स नहीं मिले होने की बात कही। उल्लेखनीय है कि इससे पहले अजमल ने जेल प्रशासन पर भोजन में घटिया बिरयानी देने का आरोप लगाया था।
निकम ने कहा कि अजमल झूठा है और मामले की सुनवाई को भरमाने के लिए वह बेबुनियाद आरोप लगा रहा है। निकम के मुताबिक मुंबई हमले की सुनवाई अब अंतिम चरण में है और अजमल को अब मालूम हो गया है कि उसे सजा दिलाने के लिए पर्याप्त सुबूत हैं।
(साभार: दैनिक जागरण)

09 अगस्त 2009

हाशमी और महेश भट्ट की नौटंकी

सदभाव बिगाड़ने की एक और 'सेकुलर' साजिश
इस देश में अल्पसंख्यक होने के कई फायदे हैं. आप बहुसंख्यकों (हिन्दुओं) की कीमत पर सारी सरकारी सुख-सुविधाएं भोगकर, मीडिया और मानवाधिकार संगठनों की छत्र-छाया पाकर भी, जुल्म का शिकार होने का रोना रो सकते हैं. आपकी चाकरी के लिए, आपके इशारों पर नाचने लिए दिन -रात देश के नेता, मीडिया और बुद्धिजीवी हाजिर रहते हैं. फिर भी इस देश के लोकतंत्र और 'सेकुलरिज्म' पर सवाल खड़े कर सकते हैं.

आप देशहित से ज्यादा अपने मजहब को रखते हैं. आप इरान में अमरीकी हमला होने पर नागपुर में हिदुओं के घर जला सकते है. तो अफगानिस्तान पर हमला होने पर लखनऊ में अन्य वर्गों की दुकाने जला सकते हैं. फिर भी 'इस्लाम खतरे में है' का एलान करके देश में फसाद कर सकते हैं. सात समंदर पार किसी अनजाने देश में अनजाने कार्टूनिस्ट द्वारा पैगम्बर साहब के कथित अपमान के नाम पर देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई की सड़के जाम कर सकते हैं. एक ऐसे ही फिल्मी 'सितारे' हैं इमरान हाशमी. आपको बता दे की कुछ साल पहले इस देश में एक और सेकुलर हाशमी पैदा हुए थे...सफ़दर हाशमी. जिनको कोंग्रेसी गुंडों ने मार दिया था लेकिन उनकी मौत के बाद उनकी बीवी शबनम हाशमी ने एक एनजीओ के नाम पर एक दूकान शुरू कर दी. मजेदार बात ये है कि आजकल वह उसी कोंग्रेस की छत्र-छाया में एनजीओ, सेकुलरिज्म, इनाम-इकराम की दूकान चला रही है. लेकिन उन हाशमी का इन हाशमी से कोई सम्बन्ध नहीं है. सिर्फ एक ही सम्बन्ध है कि वो भी सेकुलर थे... ये भी अपने सेकुलर अंकल महेश भट्ट की सरपरस्ती में सेकुलर बनने की तालीम ले रहे हैं. खबर ये हैं कि, हाशमी के अनुसार, मुम्बई के मशहूर पाली हिल इलाके में एक सोसायटी ने इमरान हाशमी साहब को मकान देने मना कर दिया, क्योंकि वह मुस्लिम हैं. फिर क्या था हाशमी साहब अपने सेकुलर अंकल के साथ पहुँच गए मीडिया और सरकार के पास. जो पहले से ही उनके लिए पलक-पांवडे बिछा कर बैठे थे. हकीकत ये है कि मुम्बई में कई शाकाहारी हिन्दू-जैन सोसायटियों में मांसाहारी हिन्दुओं को भी घर के लिए मना कर दिया जाता है. यहाँ तक कि यहाँ के मूल निवासी मराठियों को भी मना कर दिया जाता हैं. लेकिन आज तक सभी ने सोसायटी और शाकाहारी समुदायों की भावनाओं का ख़याल रखते हुए किसी किस्म का बवाल नहीं किया. और न ही महेश भट्ट जैसा कोई सेकुलर उनकी वकालात करने आगे आया. असली खबर यह है कि सोसायटी ने मना किया ही नहीं है. बल्कि हाशमी ने पब्लिसिटी स्टंट किया है. एक तो वह अपने अंकल की डी ग्रेड 'सेमी-न्यूड' फिल्मो के अलावा किसी और की फिल्म में आते नहीं, और अगर आते हैं तो फिल्म चलती नहीं. पता नहीं, आजकल कोई फिल्म उनके पास है या नहीं, लेकिन पब्लिसिटी तो मिल गयी!
खैर अल्पसंख्यक होने के नाते भेदभाव करने और परेशान करने का आरोप लगाना कोई नई बात नहीं है. इसके पहले शबाना आजमी ने भी मुस्लिम होने के नाते उन्हें मुम्बई में फ्लैट नहीं मिलने का रोना रोया था. जबकि सब जानते हैं कि उनके पिता के नाम पर मुम्बई के पोश इलाके में एक पार्क का नाम भी रखा हुआ है. इसके अलावा उनके पास मुम्बई और पुणे में कई सारे फ्लैट्स हैं. जब इस खुलासे के साथ शशिरंजन और अशोक पंडित जैसे कुछ फिल्मकारों ने प्रेस कोंफ्रेंस करके जनता को हकीकत बताई तो दूसरे दिन शबाना आजमी न केवल मीडिया की पहुँच से गायब हो गयी बल्कि, बोलती ही बंद हो गयी. सब जानते हैं कि शबाना आजमी और जावेद अख्तर को अन्य हिन्दू कलाकारों की कीमत पर इस देश ने ज्यादा सम्मान और प्यार दिया, सरकार ने भी उन्हें समय-समय पर सम्मानित किया लेकिन वह दोनों हिन्दू विरोध में कोइ क़सर नहीं छोड़ते. अपने पाप ढंकने के लिए मुस्लिम होने और भेदभाव होने का रोना रोने वाले और भी मामले अतीत में हो चुके हैं. कैसेट किंग गुलशन कुमार की ह्त्या के मामले में विदेश भाग गए संगीतकार नदीम ने और हाल ही में लोकसभा के जरिए कोंग्रेस के जरिए संसद में भेजे गए और मैच फिक्सिंग के आरोपों से गिरे क्रिकेटर अजहरुद्दीन ने भी अपने बचाव में मुस्लिम-अल्पसंखयक होने और भेदभाव होने का आरोप लगाया था. हैरत की बात है कि जब नदीम के गानों पर देश झूमता रहा और उसे सराहा तब उन्हें भेदभाव नहीं लगा. अजरुद्दीन के हजारों -लाखो फैन उनके खेल के दीवाने थे तब उन्हें भेदभाव नजर नहीं आया लेकिन जब कानून अपना काम करने लगा तब उन्हें अल्पसंख्यवाद और खुद का मुस्लिम होना याद आ गया.

लेकिन कई भले मुस्लिम भी हैं. दिवंगत फिरोज खान जैसे कलाकार पाकिस्तान में जाकर हिन्दुस्तान के अपमान पर पाकिस्तान को चेता कर खरी-खरी सुना दी थी. हैरत की बात है कि तब भी हमारे सेकुलर मीडिया और महेश भट्ट को पेट में मरोड़ आ गयी थी कि फिरोज ने गलत किया! मुम्बई में ही कई मुस्लिम कलाकारों के फ्लैट्स और बंगले बने हुए हैं. शाहरुख का चर्चित बंगला 'जन्नत' तो सभी जानते हैं. मजेदार बात यह है कि पाकिस्तान से आये मुस्लिम कलाकार अदनान सामी के भी मुम्बई में १२ फ्लैट्स हैं. जब मुम्बई में पाकिस्तानी मुस्लिम को भी इतने सारे फ्लैट्स मिल सकते हैं तो हिन्दुस्तानी मुस्लिम इमरान हाशमी और शबाना आजमी को फ्लैट नहीं मिलने वाली बात में कितनी सचाई है. दूसरी बात ये कि आज तक किसी भी अन्य तथाकथित अल्पसंख्यक वर्ग के व्यक्ति ने मुम्बई में घर नहीं मिलाने और भेदभाव का आरोप नहीं लगाया. चाहे वह जैन हो या बौद्ध, सिक्ख हो या पारसी, ईसाई हो या अहमदिया. जिस निबाना सोसायटी ने कथित तौर पर इमरान हाशमी को फ्लैट देने के लिए मना किया था वहीं पर राजा मुराद भी रहते हैं. उन्होंने हाशमी की बात को खारिज किया है. साथ ही मीडिया द्वारा विलेन के रूप में निरुपित सलमान खान ने भी खुलकर इस आरोप को गलत ठहराया. हालांकि शाहरुख खान ने बड़ी कुटनीती से जवाब देते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया तो बात-बेबात पर मीडिया में छाए रहने वाले 'सेकुलर' आमिर खान ने तो हाशमी के बयान पर कोई स्पष्ट बात करना ही मुनासिब नहीं समझा. आखिर अपने व्यक्तिगत मामलों को मजहब से जोड़कर उसे साम्प्रदायिक रंग देना किस किस्म का सेकुलरिज्म है? इसका जवाब तो भारत के लोकतंत्र और सेकुलरिज्म पर बार-बार सवाल उठाने वाले महेश भट्ट, शबाना आजमी, जावेद अख्तर जैसे लोग ही दे सकते हैं. यह लोग देश में किस तरह का सेकुलरिज्म चाहते हैं? क्या यह हस्तियाँ कल्पना कर सकती हैं, कि शबाना, महेश भट्ट और हाशमी जैसे लोगों के बयानों के कारण देश के हिन्दू-मुस्लिमो के बीच सदभाव कितना बिगड़ सकता है?
खैर ऐसे सवाल पूछने की हिम्मत न तो हमारे मुख्यधारा के मीडिया के पास है ना ही सेकुलर नेताओं के पास. और इन शबानाओं, महेश भट्टों और हाशमियों के बयान ही पाकिस्तान और कट्टरपंथी मुल्लाओं के हथियार बन जाते हैं.