25 मार्च 2010

कविता: तुम्हारी हत्या पर भी रख लेंगे २ मिनट का मौन

तुष्टिकरण से भी एक कदम आगे बढ़कर जेहाद-समर्थक हो चुके भारत के सेकुलरवाद यानी शर्मनिरपेक्षता पर करारा व्यंग्य करती युवा कवि धर्मेन्द्र शर्मा की एक कविता प्रस्तुत है.

तुम्हारी हत्या पर भी रख लेंगे २ मिनट का मौन

(अभागे भारतीय की फरियाद पर 'सिक्युलर' नेता द्वारा दी गई सलाह की तरह पढ़ें)
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अच्छा!!! वो दुश्मन है? बम फोड़ता है? गोली मारता है?
मगर सुन - दोस्ती में - इतना तो सहना ही पड़ता है

तय है - जरुर खोलेंगे एक और खिड़की - उसकी ख़ातिर
मगर - हम नाराज़ हैं - तेरे लिए इतना तो कहना ही पड़ता है

तुम भी तो बड़े जिद्दी हो - दुश्मन भी बेचारा क्या करे
इतने बम फोड़े - शर्म करो - तुम लोग सिर्फ दो सौ ही मरे ?

चलो ठीक है - इतने कम से भी - उसका हौंसला तो बढ़ता है
और फिर - तुम भी तो आखिर १०० करोड़ हो(*) - क्या फर्क पड़ता है?
[(*) ११५ करोड़ में १५ करोड़ तो विदेशी घुसपैठिये हमने ही तो अन्दर घुसाएँ हैं वोटों के लिए]

अच्छा! समझौते की गाड़ियों में दुश्मन भी आ जाते हैं???
क्या हुआ जो दिल लग गया यहाँ - और यहीं बस जाते हैं

बेचारे - ये तो वहां का गुस्सा है - जो यहाँ पर उतारते हैं
वहां पैदा होने के पश्चाताप में - यहाँ पर तुम्हें मारते हैं (क्यों न मारें?)

क्या सोचता है तू ? मरना था जिनको - वो तो गए मर
तू तो जिन्दा है ना - तो चल - अब मरने तक हमारे लिए काम कर

और क्या औकात थी उन मरने वालों की ? सिर्फ २०० रुपये मासिक कर (*१)
हम क्या शोक करें - क्यों शोक करें अब - ऐसे वैसों की मौत पर ?

अच्छा! आतंकवादी तुम्हें लूटता है? मारता है? मजहब के नाम पर ?
पर आतंकवादी का तो कोई मजहब ही नहीं होता - कुछ तो समझा कर (बेवकूफ कहीं के)

तू सहिष्णु है - भारत सहिष्णु है - यह भूल मत - निरंतर याद कर
क्या कहा? आत्मरक्षार्थ प्रतिरोध का अधिकार? - बंद यह बकवास कर (अबे,वोट बैंक लुटवायेगा क्या)

इन बेकार की बातों में - न अपना कीमती वक्त बरबाद कर
भूल जा - कुछ नहीं हुआ - जा काम पर जा - काम कर

तेरे गुस्से की तलवार को - हमारी शांति की म्यान में रख
हमने दे दिया है ना कड़ा बयान - ध्यान में रख

जानते हैं हम - इस बयान पर - वो ना देगा कान
चिंता ना कर - तैयार है - एक इस से भी कड़ा बयान

दे रक्खा है उसे - सबसे प्यारे देश का दरजा (*२)
चुकाना तो पड़ेगा ना - इस प्यार का करजा

दुनिया भर से - कर दी है शिकायत - कि वो मारता है
दुनिया को फुरसत मिले - तब तक तू यूँ ही मर जा

किस को पड़ी है कि - कौन मरा - और मार गया कौन
आराम से मर - तेरे लिए भी रख लेंगे - २ मिनट का मौन

*1 : Profession Tax Rs.200/-per month
*2 : Most Favoured Nation
रचयिता : धर्मेश शर्मा                         संशोधन, संपादन : आनंद जी. शर्मा

23 मार्च 2010

ये बाबा ! ना बाबा, ना !

मुम्बई की लोकल ट्रेन से लेकर स्थानीय अखबारों में आपको कई बाबाओं के विज्ञापन मिल जायेंगे. जैसे कि बाबा बंगाली, बाबा पाशा, बाबा जमाल, आदि आदि. ये सभी बाबा २४ घंटे में १००% शर्तियाँ इलाज करने का दावा करते हैं. विवाह-संबंधो में मनमुटाव, परीक्षा में असफलता, नौकरी में नाकामी, धंधे में परेशानी जैसी लगभग दुनिया की हर शारीरिक-मानसिक-सामाजिक-आर्थिक मुसीबत का इलाज इनके पास है!!

गौर करने लायक बात ये है कि, इन बाबाओ में अधिकाँश मुस्लिम हैं. लेकिन अपने विज्ञापनों में पूज्य साईं बाबा का फोटो और ॐ जैसे हिन्दू प्रतीक भी लगाते हैं (शायद शर्म-निरपेक्षता की सबसे बड़ी मिसाल यही बाकी है).

मजे की बात है अब तक किसी भी प्रगतिशील/अंधश्रद्धा निर्मूलन संगठन/ शर्म-निरपेक्ष चैनल /पत्रकार ने इनकी खबर नहीं ली ना ही इसके खिलाफ किसी ने आवाज़ उठाई. कोर्ट ने भी इनके खिलाफ संज्ञान नहीं लिया.

और ना ही यह सुनने में आया कि लोकल रेलवे में अनाधिकृत रूप से और गुमराह करने वाले विज्ञापन लगाने के लिए रेलवे ने कभी कोई कार्रवाई की हो!! जबकि इनका पता और फोन नंबर भी विज्ञापनों में दिया जाता है. और भोली-भाली जनता को ठगने का यह धंधा खुले आम चलता है.

इससे भी ज्यादा मजे की बात ये है कि सेकुलरो की सरपरस्ती में मुल्ला हमेशा वन्देमातरम गाने, नसबंदी कराने, हिन्दू त्यौहार मनाने के खिलाफ बार-बार फतवा जारी करने को आतुर रहते हैं. लेकिन हिन्दू प्रतीकों का इस्तेमाल करके प्रजा को मूर्ख बनाकर गाढी कमाई करनेवाले इन बाबाओं के खिलाफ किसी भी मुल्ले ने फतवा नहीं निकाला.

बात-बेबात पर हिन्दू संतो को आरोपों के आधार पर ही बदनाम करने को बेताब रहने वाले मीडिया की इस विषय में खामोशी हैरत अंगेज है.

शायद सेकुलर मीडिया अपनी नपुंसकता का इलाज करने के लिए इन बाबाओं के पास जाता हो??

16 मार्च 2010

आरक्षण के लिए मुस्लिमो की धमकी!

अब मुस्लिमो ने बाकायदा कोंग्रेस को धमकी दे डाली है कि अगर मुस्लिमो को आरक्षण नहीं दिया तो वोट नहीं मिलेंगे! कोई शक नहीं कि वोट बैंक की लालच में कोंग्रेस घुटने टेक दे और प्रतिभा की कीमत पर तुष्टिकरण हावी हो जाए. सेकुलरवाद की आड़ में मुस्लिम तुष्टिकरण के काले इतिहास वाली कोंग्रेस ने पहले भी मुस्लिम आरक्षण के हथकंडे अपनाए हैं. आँध्रप्रदेश में कोशिश की लेकिन कोर्ट ने पानी फेर दिया. बंगाल में अपना जनाधार खो रहे कम्युनिस्ट भी मुस्लिमो को आरक्षण देने को बेताब हैं. और बाकायदा घोषणा भी कर दी है. कर्नाटक में तो कोंग्रेस ने आरक्षण दे डाला है और आज भी बदस्तूर जारी है. नतीजन अब आरक्षण को अपना हक़ मानने वाले मुस्लिम आक्रामक रुख में नजर आ रहे हैं... और कोंग्रेस-कम्यूनिस्टो द्वारा पैदा किया भस्मासुर उन्ही को धमका रहा है. 
वोट बैंक के लालच में जब कोंग्रेस का प्रधानमंत्री यह कहे कि इस देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों का है. जब पासवान जैसे नेता बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री की वकालात करे. जब गांधी परिवार का युवराज देश का प्रधानमंत्री मुस्लिम को बनाने का झुनझुना बजाये तो लाजिमी है कि मुस्लिम आरक्षण के लिए दादागिरी करें. मजे की बात ये है कि अपनी मजहबी कट्टरता और अन्य कारणों से पिछड़ा रहनेवाला मुस्लिम समाज अपने पिछड़ेपन की जिम्मेदारी का ठीकरा देश पर फोड़कर अपना तथाकथित हक़ मांग रहा है. सच्चर और रंगनाथ मिश्र जैसे महानुभावो की रिपोर्टो ने अब उनके हौंसले और बुलंद हो गए हैं. तो इधर विकास, सुशासन, महंगाई, ईमानदारी और नैतिकता जैसे मुद्दों पर फिसड्डी साबित हो रहे कोंग्रेस, कम्युनिस्ट और सपा-बसपा-राजद-पासवान जैसे दल आरक्षण की रेवडिया बांटकर सत्ता सुख भोगने को आतुर हैं. देश जाए भाड़ में, प्रतिभाएं भी जाए भाड़ में, एकता और समानता भी जाए भाड़ में...बस इन्हें सत्ता चाहिए..
आइए इस सम्बन्ध में बीबीसी हिन्दी पर छपी खबर पर गौर करते हैं..
आरक्षण नहीं तो वोट नहीं' का नारा 
उमर फ़ारूक़ | बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद से
शनिवार रात को हैदराबाद में मुसलमानों ने एक बड़ी रैली की. इस रैली में मुस्लिम संगठनों ने बड़ी संख्या में भाग लेकर अपनी शक्ति का ज़बरदस्त प्रदर्शन किया.
रैली में कांग्रेस पार्टी को चेतावनी दी गई है कि अगर मुसलमानों को आरक्षण नहीं दिया गया तो अगले चुनाव में वे कांग्रेस पार्टी को वोट नहीं देंगे.
रैली में यह भी मांग की गई कि महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण देने वाले विधेयक में संशोधन किया जाए. इसमें मुसलमान और अन्य पिछड़ी जातियों की महिलाओं को अलग से आरक्षण दिया जाए ताकि उन्हें भी प्रतिनिधित्व मिल सके.
रैली में तक़रीबन एक लाख मुसलमानों ने भाग लिया.
गत महीने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य में मुसलमानों को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में दिया गया चार फ़ीसदी आरक्षण रद्द कर दिया था.
तभी से मुसलमान राज्य सरकार पर दबाव डाल रहे हैं कि इस आरक्षण को जारी रखने के लिए कदम उठाया जाए.
रैली का आयोजन मुस्लिम मुत्तहेदा मजलिस-इ-अमल ने किया था.
रैली को स्थानीय नेताओं के अलावा राज्य सभा के उन तीन सदस्यों ने भी संबोधित किया जिन्हें हाल ही में महिला विधेयक पर चर्चा के दौरान अव्यवस्था फैलाने पर राज्य सभा से निलंबित कर दिया गया था.
इनमें निर्दलीय एजाज़ अली, लोक जन शक्ति के सबीर अली और समाजवादी पार्टी के कमाल अख्तर शामिल थे.
आरक्षण मुसलमानों का संवैधानिक अधिकार
हैदराबाद के सांसद और मज़लिस के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि मुसलमान आरक्षण के लिए भीख नहीं मांग रहा है बल्कि यह उसका संवैधानिक अधिकार है. यह अधिकार उसे मिलना ही चाहिए.
उन्होंने कहा कि गत 50-60 वर्षों में मुसलमान इतना पिछड़ गया है कि उसकी हालत दलितों से भी ख़राब हो गई है. स्वयं सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग ने अपनी रिपोर्टों में इसका उल्लेख किया है और मुसलमानों के साथ न्याय की ज़रुरत बताई है.
रैली में पारित प्रस्तावों में मांग की गई कि आंध्र प्रदेश में मुसलमानों के लिए 4 फ़ीसदी आरक्षण बहाल किया जाए. यह भी कि रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिश के अनुसार मुसलमानों को 10 फ़ीसदी आरक्षण दिया जाए और महिला आरक्षण विधेयक में संशोधन करके मुसलमान और अन्य पिछड़ी जातियों की महिलाओं को भी आरक्षण दिया जाय.
रैली में विभिन्न दलों के नेता

रैली में जिन स्थानीय नेताओं ने संबोधित किया उनमें तेलुगु देशम के लालजन बाशा और कांग्रेस पार्टी के मोहम्मद अली शब्बीर थे.
इन नेताओं ने कहा कि आरक्षण के मुद्दे पर तमाम मुसलमान एक हैं चाहे उनका सम्बन्ध किसी भी दल से हो.
शब्बीर ने आश्वासन दिया, ‘‘राज्य सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि मुसलमान छात्रों को अगले वर्ष भी आरक्षण का फ़ायदा मिले और इस संबंध में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई है.’’
डॉ. एजाज़ अली ने कहा कि संविधान की धारा 143 में आरक्षण के मामले में धर्म के आधार पर भेदभाव बरता गया है. इसलिए इसमें संशोधन होना चाहिए ताकि मुसलमानों को बराबर का अधिकार मिल सके.
राज्य सभा के बाकी दोनों सदस्यों- लोक जन शक्ति के सबीर अली और समाजवादी पार्टी के कमल अख्तर ने भी मुसलमानों के लिए आरक्षण के विषय को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने और सरकार पर दबाव बढ़ाने की ज़रुरत पर जोर दिया.

सेकुलर उवाच:
''राज्य सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि मुसलमान छात्रों को अगले वर्ष भी आरक्षण का फ़ायदा मिले और इस संबंध में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई है.'' मुहम्मद अली शब्बीर, कांग्रेसी नेता  

मीडिया को चर्च के पाप नहीं दिखते !


इसे चर्च का चतुर मीडिया मैनेजमेंट कहा जाए या भारतीय मीडिया का बिकाऊ चेहरा या फिर हिन्दुओं की उदासीनता जिसमे अपने खिलाफ फैलाए जा रहे कुचक्रो का भान नहीं है.

हमेशा ही हिन्दू संतो को लेकर सेकुलर मीडिया काफी  बवाल करता है. धर्म के पाखंडी किसी भी धर्म में हो उनका पर्दाफ़ाश और निंदा होनी चाहिए. लेकिन मीडिया और सेकुलरो की हिन्दू संतो को लेकर अति सक्रियता से प्रतीत होता है कि वह जान-बुझकर हिन्दू संत और सन्यासी परम्परा को बदनाम कर रहा है. कई मामलो में तो हमारा मीडिया मामले की छानबीन से पहले ही खुद जज की तरह एकतरफा फैसला दे देता है और संतो का चरित्रहनन करके और उनके खिलाफ माहौल बनाकर निष्पक्ष जांच को प्रभावित करने की चेष्टा करता है.

दूसरी तरफ वह ईसाई पादरियों और मौलवियों की करतूतों पर पर्दा डालने की हर मुमकीन कोशिश करता है और कई गंभीर खबरों को भी दबा देता है. कुछ समय पहले केरल के एक पादरी द्वारा एक नन के यौन शोषण की खबर आपको ढूंढें भी नहीं मिलेगी. इसी तरह मुम्बई और पुणे में चर्च के एक फादर अमोलिक ने करोडो -खरबों रुपये की चर्च की जमीन बिल्डरों को बेच दी लेकिन अधिकाँश मीडिया ने खबर दबा दी. हाल ही में ईसाइयों के मुख्यालय वैटिकन में वैश्यावृति और वह भी पुरुष वैश्यावृत्ति का मामला सामने आया है. जिसमे चर्च और वेटिकन के बड़े-बड़े दिग्गज लिप्त हैं. लेकिन सेकुलर मीडिया मौन है. आइये इस सम्बन्ध में बीबीसी पर छपी इस छोटी सी खबर पर नजर डालते हैं.

वैटिकन में पुरुष वेश्यावृत्ति का मामला
वैटिकन में धार्मिक संगीत मंडली के एक मुख्य गायक और पोप के एक सहयोगी को पुरुष वेश्यावृत्ति के आरोप में पद से बर्ख़ास्त कर दिया गया है.
गायक टॉमस हीएम पर पोप बेनेडिक्ट के एक सहयोगी एंजेलो बालडोची को यौन संबंध बनाने के लिए पुरुष यौनकर्मी मुहैया करवाने के आरोप हैं.
इन पुरुष यौनकर्मियों में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे पादरी भी शामिल बताए गए हैं.
वैटिकन का कहना है कि पोप को इन आरोपों के बारे में जानकारी है.
रोम के अख़बारों में ये ख़बर पहले पन्ने की सुर्ख़ियों में छपी है. कुछ अख़बारों ने इसे वैटिकन सेक्स स्कैंडल नाम दिया है.
रिपोर्टों के मुताबिक वैटिकन में धार्मिक संगीत की गायक मंडली के प्रमुख 29 वर्षीय टॉमस हीएम पोप के एक सहयोगी एंजेलो बालडोची के लिए एक पुरष वेश्या का इंतज़ाम कर रहे थे.
ग़ौरतलब है कि एंजेलो बालडोची जैंटलमैन ऑफ हिज़ होलीनैस के रूप में जाने जाते रहे हैं, जो वैटिकन में आने वाले विशिष्ट अतिथियों के स्वागत समारोह में पोप के आगे चलते थे.
पुलिस ने इन दोनों व्यक्तियों के बीच टेलिफोन पर हुई बातचीत को टैप करके इस रैकेट का भंडाफोड़ किया.
पुलिस भ्रष्टाचार के किसी अन्य मामले की जांच के लिए बालडोची के फोन को टैप कर रही थी तभी इस घोटाले का पर्दाफ़ाश हुआ.
मीडिया के हाथ लगी इस बातचीत से पता लगा कि टॉमस हीएम ने बालडोची को यौन संबंध बनाने के लिए कम से कम 10 पुरुषों से मिलवाया, जिनमें मॉडल और एक रगबी का खिलाड़ी भी शामिल है.
वैटिकन ने इन दोनों व्यक्तियों को पद से हटाए जाने की पुष्टि कर दी है.

19 फ़रवरी 2010

'खान' में नहीं है जान !


जनमानस में इस्लाम के जेहादी स्वरूप को भुलाने के लिए  'छवि सुधारक अभियान' के तहत बनाई गयी फिल्म माय नेम इज खान अब चारो खाने चित्त होती नजर आ रही है. 'खान' भयभीत-पोषित मीडिया चाहे कुछ भी दावे कर ले लेकिन जनता ने लगभग इस फिल्म को ठुकरा दिया है और इसका हश्र सैफ अली खान अभिनीत कुर्बान जैसी होने की पूरी उम्मीद है.

शिव सेना के विरोध और मीडिया द्वारा खान-गुणगान के कारण शुरूआत में भले ही इस फिल्म ने शाहरुख के अंधभक्तो की भीड़ जुटाई हो लेकिन  अब यह खेल लंबा नहीं चल रहा है. क्योंकि लोग झांसे में आकर एक बार फिल्म देखने भले ही चले जाए, बार-बार उन्हें बेवकूफ बनाना मुश्किल है. शायद लोगो की समझ में भी आ गया होगा की माय इज इज खान पर १०-२० रुपये खर्च करके उसे पायरेटेड सीडी पर देखना ही मुनासिब है. कोंग्रेस और मेडम सोनिया के करीबी शाहरुख खान की लाज बचाने के लिए अब एक ही उपाय है कि भोंदू युवराज की युवक कोंग्रेस या एन एस यु आई टिकट खरीदकर लोगो में मुफ्त बांटे.
 
पीवीआर सिनेमा में थियेटर की सीट-भराई ९०% गिरकर सोमवार को ५०% हो गयी. वही स्पाइस सिनेमा का कहना है कि, .. खान की टिकट बिक्री में बुधवार को २०% और गुरूवार को ३०% गिरावट आई.

बिना मनोरंजक गुणों के सिर्फ प्रोपेगेंडा के लिए बनाई जाने वाली फिल्मो का हश्र ऐसा ही होता है.
 
विस्तार से पढने के लिए वन इंडिया पोर्टल पर छपी खबर पर गौर करें. लिंक दिया जा रहा है...

13 फ़रवरी 2010

मेरा मीडिया महान: युवराज के बाद अब खान का यशोगान!


आखिर 'माय नेम इज खान' को लेकर शाहरुख बनाम शिवसेना की जंग में शाहरुख के पक्ष में माहौल बनाकर मीडिया ने शाहरुख को 'विजेता' घोषित कर ही दिया है. और शाहरुख को विजेता घोषित करने में मीडिया को अपने सेकुलर आका कोंग्रेस को भी गरियाना पडा...कि सरकार ने वादा करके भी फिल्म की रिलीज में शिवसेना की अड़चन को दूर नहीं किया. जैसेकि सरकार के पास फिल्म रिलीज कराने के अलावा कोई और काम ही नहीं हो.

हकीकत ये है कि, जब सेकुलर निजाम ने अपने सारे सिपाही शाहरुख के पोस्टरों की रखवाली में तैनात किए हो, जब मीडिया वास्तविक मुद्दे ताक में रखकर शाहरुख के महिमा मंडन में लग जाए तो शाहरुख क्या किसी की भी फिल्म की औकात बढ़ जायेगी. मुम्बई में शिवरात्री पर हाल ये था की बाबुलनाथ और पवई शिवालयो समेत प्रमुख मंदिरों में (जहां लाखो भक्त दर्शन हेतु आते हैं) पर्याप्त सुरक्षा इन्तेजाम नहीं था, क्योकि अधिकाँश पुलिस बल उस शाहरुख खान की फिल्म रिलीज करने के लिए तैनात था, जो खुद को इस्लामिक आइकन मानता है और दुबई में जा बैठा है. जो २६/११ मुम्बई समेत हिन्दुस्तान में हुए तमाम आंतकी हमलो के केंद्र पाकिस्तान की पैरवी करता है. हालांकि मीडिया में इतनी हिम्मत कहाँ कि, शाहरुख से इस पाकिस्तान-प्रेमी बयान के बारे में पूछे. बल्कि मीडिया ने भरपूर कोशिश की कि यह विवाद व्यवस्था बनाम-फिल्म उद्योग बन जाए, क्षेत्रवाद बनाम-राष्ट्रवाद बन जाए, हिन्दू-बनाम मुस्लिम बन जाए, लेकिन भारत-प्रेमी और भारत-विरोधी न बन पाए. मीडिया या जमात -ए-सेकुलर ने कभी भी शाहरुख या करण जैसे लोगो से यह नहीं पूछा कि 'माय नेम इज खान' ही क्यों? 'माय नेम इज कश्मीरी पंडित' क्यों नहीं? 'माय नेम इज पाकिस्तानी हिन्दू' क्यों नहीं? 'माय नेम इज तसलीमा' क्यों नहीं? आखिर वह अपनी फिल्मो के माध्यम से किस तरह के अल्पसंख्यकवाद को स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं? और छवि-तोड़क फिल्मे बनाने के लिए इतने उतारू क्यों हैं?

शाहरुख़ खान की असली सेकुलरी तो तब दिखती जब वह एक मुस्लिम होने के बावजूद कश्मीरी हिन्दूओ पर हुए जुल्मो-सितम पर फिल्म बनाकर उसे देश-दुनिया के सामने लाते. और जेहादी दशहतगर्दी को लानत-मलालत करते और इस्लाम के सच्चे बन्दे होने के नाते इस्लामी-आंतक के खिलाफ खुलकर बोलते.  खैर अब तक की उनकी बातो को देखकर नहीं लगता कि वह कोई ऐसी हिम्मत करे. क्योंकि ऐसा होने पर उनके खिलाफ फ़तवो की दूकान खुल जायेगी या दुबई से बड़े 'भाई' का कॉल आ जाएगा. और अगर उनको भी धता बताकर एक असली खान-पठान का दम-ख़म दिखाकर कश्मीरी/पाकिस्तानी/बांग्लादेशी या मलेशियाई हिन्दू की पीडाओ पर कोई फिल्म बनाने की कोशिश भी करे तो हमारे सेकुलर नेता और मीडिया उन्हें बनाने नहीं देगी.

अब खबर ये है कि, कोंग्रेसी नेता शाहरुख खान के टिकट थोक के भाव खरीदकर लोगो को मुफ्त बाँट रहे है. इसका भी उनको फायदा मिलने ही वाला है. क्योंकि इस फिल्म में भी उसी 'अल्पसंख्यकवाद' को स्थापित और महिमा मंडित करने का प्रयास किया गया है, जो कोंग्रेस के लिए वोट बैंक की जमीन तैयार करता है.हो सकता है कि आगामी दिनों में कोंग्रेस सेवादल या एन एस यु आई के कार्यकर्ता देश के सिनेमाघरों के बाहर ..खान के टिकट ब्लैक में बेचते नजर आएं.

इस सारे घटनाक्रम से कई सवाल उपजे हैं. क्या भारत की जनता के पैसो से हिट -सुपरहिट होने वाले कलाकार की अपनी पाकिस्तानी भाइयो की पैरवी सही है? क्या मीडिया फिल्म या व्यक्ति विशेष के लिए ही भोंपू बनाकर महंगाई, आतंरिक सुरक्षा जैसे मुद्दों को दबा दे यही पत्रकारिता है. देखना ये है कि पाकिस्तान-परस्त शाहरुख खान को हिन्दुस्तान-परस्त शिवसेना के सामने भारी दिखाने का यह खेल कितने दिन टिकता है? खैर इस सारे प्रकरण में मीडिया और शाहरुख खान ने अपनी जात दिखा दी है, जिसका असर उनकी आगामी फिल्मो पर भी पड़ा सकता है. 

सटाक: भाई अनिल पुसदकर ने अपने ब्लॉग पर सौ टके की बात कही है: 'अगर मीडिया महंगाई कम करने के लिए इतनी मेहनत से सरकार पर दबाव डालती तो एक शाहरुख खान क्या सारे हिन्दुस्तान की प्रजा को राहत मिलती.'

माई नेम इज पाकिस्तान!!


भारत में पाकिस्तानी खिलाड़ियों, फ़िल्मी एक्टरो और फूहड़ मसखरो का विरोध करने पर महेश भट्ट से लेकर जावेद अख्तर और उनकी बेगम तथा शाहरुख खान, आमिर खान समेत  जमात-ए-सेकुलर की पेट में मरोड़ आ जाती है.  तो दूसरी ओर लता मंगेशकर और जगजीत सिंह जैसी उम्दा भारतीय कलाकारों और फिल्मो को पाकिस्तान अपने देश में सम्मान करना तो छोड़ो कार्यक्रम तक की इजाजत नहीं देता. जबकि भारत की धरती पर जेहादी आतंक का नंगा नाच करके खून की नदिया बहाने वाले पाकिस्तान के किसी भी खिलाड़ी ने आज दिन तक कभी भी विरोध तो छोड़ो, जेहादी आंतक की जबानी निंदा व भर्त्सना तक नहीं की है. जबकि हमारे सेकुलर 'खेल और कला को राजनीति से ऊपर रखने' की दुहाई देकर उनके लिए भारत में पलक पांवड़े बिछाते रहते हैं.
हाल ही में शाहरुख खान और आमिर खान समेत जावेद अख्तर ने अपना पाकिस्तान प्रेम दर्शाया था. तो दूसरी ओर ताजा खबर ये है कि पाकिस्तान में एक भारतीय फिल्म दिखाए जाने पर सिनेमाघर को ही सील कर दिया. बहरहाल इस मुद्दे पर भारतीय सेकुलरो के मुंह भी 'सील' हो गए हैं. आइए एक नजर डालते हैं दैनिक जागरण में छपी इस खबर पर..

''इस्लामाबाद। पाक अधिकृत कश्मीर [पीओके] में भारतीय फिल्म प्रदर्शित करने पर शुक्रवार को एक सिनेमाघर सील कर दिया गया।

सरकारी संवाद एजेंसी एपीपी के मुताबिक मीरपुर में एक सिनेमाघर को भारतीय फिल्म दिखाने के कारण बंद कर दिया गया है। मीरपुर के उपायुक्त मुहम्मद तैयब ने कहा कि जब आकाश सिनेमाघर में छापा मारा गया तो वहां भारतीय फिल्म दिखाई जा रही थी। सिनेमाघर के मालिक के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।''

31 जनवरी 2010

बोर्डर पार करने की सजा और मजा !




कहाँ बोर्डर पार करे और कहाँ  नहीं?

अगर आप गैर-कानूनी ढंग से उत्तरी कोरिया का बोर्डर पार करे तो १२ साल की सश्रम कारावास सजा मिलेगी.
अगर आप गैर-कानूनी ढंग से इरानी बोर्डर पार करेंगे आपको अनिश्चित अवधि तक जेल में बंद कर दिया जाएगा.
अगर आप गैर-कानूनी ढंग से अफगान बोर्डर पार करेंगे तो आपको गोली मार दी जाएगी.
अगर आप गैर-कानूनी ढंग से सउदी अरब बोर्डर पार करेंगे तो आपको जेल में ड़ाल दिया जाएगा.
अगर आप गैर-कानूनी ढंग से चीनी बोर्डर पार करेंगे तो आप फिर कभी नजर नहीं आएँगे.
अगर आप गैर-कानूनी ढंग से वेनेजुएला बोर्डर पार करेंगे तो आपको जासूस होने का चस्पा लगा दिया जाएगा, और फिर क्या होगा आपको मालुम है.
अगर आप गैर-कानूनी ढंग से क्यूबा का बोर्डर पार करेंगे तो आपको राजनीतिक शत्रु मानकर जेल में सड़ने के लिए ड़ाल दिया जाएगा.
अगर आप गैर-कानूनी ढंग से ब्रिटेन के बोर्डर को पार करेंगे तो आपको गिरफ्तार करके, मुकदमा चलाया जाएगा और फिर तडीपार किया जाएगा.

लेकिन..
अगर आप पाकिस्तानी या बांग्लादेशी हो और गैर-कानूनी ढंग से भारतीय सीमा में घुसे तो आपको यह नजराने मिलेंगे:
  • राशन कार्ड
  • पासपोर्ट (एक या अधिक)
  • हज सबसिडी
  • ड्राइविंग लायसेंस
  • वोटर परिचय-पत्र
  • नौकरी में आरक्षण
  • बैंक लोन में आरक्षण
  • अल्पसंख्यक (वोट बैंक) होने के नाते विशेष सुविधाएं
  • क्रेडिट कार्ड
  • रियायती किराया या घर खरीदने के लिए लोन
  • मुफ्त शिक्षा
  • मुफ्त चिकित्सा सुविधाएं.
  • आपकी चाकरी में सेकुलर मीडिया 
  • नई दिल्ली में आपकी पैरवी करने वाले वकील, मानवाधिकार वादी और सेलिब्रिटी.
  • सेकुलरिज्म पर बड़ी-बड़ी बाते करने का हक, जो आपको अपने मुल्क में कभी ना मिला.
  • और हाँ सबसे बड़ा हथियार---वोट डालने का अधिकार!
यानी जिस घुसपैठ के लिए दूसरे देशो में आपको कड़ी सजा मिलती है, उसी घुसपैठ के लिए भारत में सेकुलर नेता इनाम-इकराम की बरसात करते हैं!

भारत की सेकुलर राजनीति की जय हो!!

23 नवंबर 2009

२६/११ की बरसी और अजमल की बिरयानी !


एक ओर सारा देश २६/११ के मुम्बई पर हुए हमले की बरसी मना रहा है, वही दूसरी ओर अजमल कसाब को 'अच्छी' बिरयानी चाहिए. मुम्बई पर हुए हमले के दौरान पकडे गए और कई मासूम लोगों की बेरहम ह्त्या करने वाले अजमल कसाब सरकारी खर्चे पर एश करते हुए आए दिन नए-नए शफूगे छोड़कर कोर्ट और देश- दुनिया को गुमराह कर रहा है. एक अफजल गुरु सजायाप्ता होने के बावजूद  दिल्ली में सरकारी जमाई बनकर बिरयानी खा रहा है तो दूसरा मुम्बई में अच्छी बिरयानी के लिए धौंस जमा रहा है. और सरकार व पुलिस को टरका रहा है. सेकुलर राजनीति के वोटो के लालच में आतंकियों की अगवानी की प्रवृत्ति के चलते उसके दुस्साहस की बानगी देखिये...यह खबर छपी है दैनिक जागरण में.

अजमल का आरोप, मेरे खाने में ड्रग्स 

Nov 18, 12:00 am

मुंबई। पाकिस्तानी आतंकी मुहम्मद अजमल अमीर इमान उर्फ अजमल कसाब ने आतंकवाद निरोधी अदालत से शिकायत की है कि उसे जेल में खाने में ड्रग्स मिलाकर दिया जा रहा है। चिकित्सा विशेषज्ञों ने गत वर्ष 26 नवंबर के आतंकी हमले के दौरान जिंदा गिरफ्तार एकमात्र आतंकी अजमल के इस आरोप को खारिज कर दिया है।
विशेष लोक अभियोजक उज्ज्वल निकम ने बुधवार को यहां बताया कि अजमल ने कुछ दिन पहले न्यायाधीश एम.एल. तहलियानी से शिकायत की थी कि उसे जो भोजन दिया जा रहा है, उसमें ड्रग्स मिला होता है। उसने अपने आरोप को साबित करने के लिए खाने के लिए मिले चावल के नमूने भी अदालत को दिए थे।
उसकी शिकायत का संज्ञान लेते हुए अदालत ने उस नमूने को चिकित्सा विशेषज्ञों की राय जानने के लिए भेजा था। निकम ने बताया कि विशेषज्ञों ने चावल में कोई ड्रग्स नहीं मिले होने की बात कही। उल्लेखनीय है कि इससे पहले अजमल ने जेल प्रशासन पर भोजन में घटिया बिरयानी देने का आरोप लगाया था।
निकम ने कहा कि अजमल झूठा है और मामले की सुनवाई को भरमाने के लिए वह बेबुनियाद आरोप लगा रहा है। निकम के मुताबिक मुंबई हमले की सुनवाई अब अंतिम चरण में है और अजमल को अब मालूम हो गया है कि उसे सजा दिलाने के लिए पर्याप्त सुबूत हैं।
(साभार: दैनिक जागरण)

22 नवंबर 2009

बयान-ए-सेकुलर : १

अजहरुद्दीन पर लगा प्रतिबन्ध हटा देना चाहिए.--राजीव शुक्ला, कोंग्रेसी नेता.
(क्योंकि जनाब अजहर वह सब काबिलियत रखते हैं जो सेकुलरों को भाती हैं और इस देश को डूबाती हैं. मसलन वह कोंग्रेसी सांसद हैं, मैच फिक्सिंग के आरोपी रह चुके हैं, मुस्लिम हैं, मैच फिक्सिंग प्रकरण के दौरान विदेश भागकर, मुस्लिम होने के नाते भारत सरकार द्वारा भेदभाव करने का आरोप लगा चुके हैं.) इनकी ज्यादा और असली तारीफ़ पढनी है तो जनोक्ति पढ़ें. बड़ा सटीक लिखा है.

सेकुलर को नहीं दोष गुसाई-१


लगता है इस देश में सेकुलर होने से आपको कोई भी जुर्म करने का लायसेंस मिल जाता है. चाहे आपने ह्त्या की हो, करोडो के घोटाले किए हो, जनता के साथ धोखा किया हो, देश का सम्मान गिरवी रखकर अमेरिका के पैरो में दंडवत किया हो, खूंखार आतंकी कि सजा माफ़ कर दी हो, यहाँ सब माफ़ है. बस आप सेकुलर हैं तो मीडिया से लेकर मानवाधिकारवादी और जेएनयु प्रायोजित बुद्धिजीवी से लेकर 'नामवर' साहित्यकार सब आपको माफ़ कर देंगे और आपके खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे. क्योंकि आप इस देश के महान सेकुलर (यानी हिन्दू द्वेषी) हैं. मीडिया आपसे आड़े-टेढ़े सवाल नहीं पूछेगी. आपके खिलाफ खबरे देकर लोगो को जागरुक करने का तो प्रश्न ही नहीं है. उलटा आपको महान बताकर गुणगान ही करेंगी. पेश है दिल्ली की सेकुलर कोंग्रेसी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित  की काली करतूत का एक नजारा. जिन्होंने जेसिका लाल मर्डर केस के दोषी और हरियाणा के कोंग्रेसी नेता के सपूत मनु शर्मा को मौजा-मस्ती के लिए पैरोल पर छुडवाकर कानून-व्यवस्था के धज्जियां उडाई. अगर यह किसी शिवराज, मोदी, येदीयुरप्पा, या रमनसिंह ने किया होता तो मीडिया का कवरेज कितना भयानक और तीस्ता जावेद सेतलवाड से लेकर हर्ष मंदार और महेश भट्ट जैसे स्वयंभू 'मानवाधिकारवादी' कितने सक्रीय होते, इसकी आप सहज कल्पना कर सकते हैं. पेश है दैनिक जागरण में छपी खबर की एक कतरन..


पैरोल के तरीके पर सरकार को फटकार

नई दिल्ली, राज्य ब्यूरो: मॉडल जेसिका लाल हत्याकांड मामले में उम्रकैद की सजा भुगत रहे मनु शर्मा को पैरोल देने के तरीके पर हाईकोर्ट ने आपत्ति जताई है। जस्टिस कैलाश गंभीर ने दिल्ली सरकार की खिंचाई करते हुए कहा है कि उच्चस्तरीय संपर्क वाले दोषियों को पैरोल देने में तवज्जो दी गई है। पैरोल आवेदनों की संख्या वाली सूची निराशाजनक तस्वीर पेश कर रही है।
शुक्रवार को जस्टिस कैलाश गंभीर ने कहा कि सामान्य मामलों में सरकार किसी दोषी के पैरोल आवेदन पर फैसला करने में तीन से छह महीने का समय लगाती है, लेकिन जेसिका हत्याकांड मामले में दोषी मनु शर्मा की याचिका को दिल्ली सरकार ने 20 दिनों के भीतर ही स्वीकार कर लिया। अन्य मामलों की लंबी सूची सरकार की प्राथमिकता दर्शाने के लिए काफी है। इसमें संदेह नहीं कि दिल्ली सरकार के गृह विभाग ने कुछ दोषियों के उच्चस्तरीय संपर्क के चलते उन्हें खास तवज्जो दी।
अदालत ने पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया है कि दिल्ली निवासी दोषियों के पैरोल आवेदनों को 10 दिनों और दिल्ली के बाहर रहने वालों का आवेदन 20 दिनों में सत्यापन कराएं। अदालत ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया है कि कम से कम 15 दिन और अधिकतम एक महीने में पैरोल आवेदनों का निपटारा सुनिश्चित करें।
कनॉट प्लेस शूटआउट मामले में दोषी सुमेर सिंह की याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत ने ये बातें कहीं। सुमेर ने अपने बचाव में सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाने के लिए इस आधार पर तीन महीने की पैरोल मांगी है कि उसके परिजन अनपढ़ हैं।
हाईकोर्ट ने सरकार के रवैये पर निराशा जताते हुए 10 नवंबर को दिल्ली सरकार के गृह सचिव को नोटिस भेजते हुए निजी तौर पर अदालत में पेश होने का हुक्म दिया था, ताकि वह पैरोल आवेदनों से निपटने के संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद हो रही देरी के संबंध में सफाई दे सकें। अदालत ने 10 नवंबर को हुई अंतिम सुनवाई में पैरोल मामलों के संबंध में सरकार द्वारा निर्देशों के पालन न करने पर कड़ी आपत्ति जताई थी।
गौरतलब है कि जेसिका लाल हत्याकांड मामले में दोषी मनु शर्मा को उसकी मां के अस्वस्थ होने के आधार पर 22 सितंबर को पैरोल पर रिहा किया गया था।
(Source: दैनिक जागरण:Nov 20, 11:51 pm ) 

05 नवंबर 2009

मेरा सेकुलर महान!

तसलीमा को देश निकाला,

हुसैन को मिले सम्मान.

हिन्दू द्वेष को मिलता है

इस देश में सेकुलर नाम.

कभी नंगे पैर घुमकर

कभी देवताओं के नंगे चित्र

अपने मोल बढाने की

ये प्रथा चली विचित्र.

वोट के खातिर घुटने टेके

विकृत के सामने सरकार.

सोया हिन्दू कब करेगा

इस जुल्म का प्रतिकार.

करे प्रतिकार तो मीडिया भौंके,

भौंके सारा जहां,

इसी को कहते हैं भारत का

मेरा सेकुलर महान.

--


13 अगस्त 2009

सेकुलर पासवान को चाहिए विहिप पर प्रतिबन्ध

लगता है जमात-ए-सेकुलर के नेताओं में सबसे ज्यादा सेकुलर (यानी हिन्दू-विरोधी) साबित करने की होड़ मची हुई है. इस दौड़ में जो सबसे आगे रहेगा उसे ज्यादा से ज्यादा थोक के भाव मुस्लिम वोट मिलने की उम्मीद है. भारत में कई आंतकवादी गतिविधियों में लिप्त पाए गए सिमी जैसे जेहादी संगठन पर से प्रतिबन्ध हटाने और उससे हमदर्दी रखने वाले लोकजनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष और दलितों के मसीहा रामविलास पासवान अब मुस्लिमों के मसीहा बनाने के चक्कर में हैं. हाल ही में उन्हें फिर से सेकुलर दौरा पडा है और वह विश्व हिन्दू परिषद पर प्रतिबन्ध की मांग कर रहे हैं. पासवान की नजर में बम फोड़ने वाला सिमी सही है और अब तक किसी भी आतंकवादी गतिविधी में अलिप्त रहा विहिप गलत है. और तो और खुले आम धर्मांतरण करा रही मिशनरी स्कूलों से उन्हें कोई समस्या नहीं लेकिन राष्ट्रीयता और देशभक्ति के संस्कार देने वाले संघ प्रेरित स्कूलों से भी उन्हें तकलीफ है. यानी पासवान जी की माने तो परोक्ष-अपरोक्ष रूप से देश को तोड़ने वाली शक्तियां सेकुलर और सही हैं, और देश की अस्मिता की रक्षा में जुटी संस्थाएं व संगठन साम्प्रदायिक. जे हो सेकुलरिज्म. आइए हमारे महान सेकुलर नेता ने क्या कहा, यह जानने के लिए दैनिक जागरण में छपी खबर पर गौर फरमाते हैं:
पासवान ने की विहिप पर प्रतिबंध की मांग Aug 13, 05:49 pm
गया। लोक जनशक्ति पार्टी [लोजपा] के अध्यक्ष एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने कहा है कि राष्ट्रहित में विश्व हिंदू परिषद [विहिप] पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ [आरएसएस] के अधीन चल रहे शिक्षण संस्थानों की जांच की जानी चाहिए। लोजपा के तनी दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा लेने बोधगया आए पासवान ने गुरुवार को पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहा कि विहिप देश में धर्म के नाम पर समाज को बांटने का काम करती रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि आरएसएस के शिक्षण संस्थानों में जाति और धर्म का पाठ पढ़ाया जाता है, जिसमें बच्चों में गलत संदेश जा रहा है। उन्होंने विहिप पर प्रतिबंध तथा आरएसएस संचालित शिक्षण संस्थानों की जांच कराने की मांग की। पासवान ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर आरोप लगाया कि वह दलित और महादलित का वर्गीकरण कर समाज को तोड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि दलित और महादलित का संविधान में किसी प्रकार की चर्चा नहीं है। उन्होंने कहा कि लोजपा रंगभेद, धर्मभेद और जातिभेद के खिलाफ है। आज कई संगठन जाति और धर्म के नाम पर देश को खंडित करने में लगे है। (साभार: दैनिक जागरण)

09 अगस्त 2009

हाशमी और महेश भट्ट की नौटंकी

सदभाव बिगाड़ने की एक और 'सेकुलर' साजिश
इस देश में अल्पसंख्यक होने के कई फायदे हैं. आप बहुसंख्यकों (हिन्दुओं) की कीमत पर सारी सरकारी सुख-सुविधाएं भोगकर, मीडिया और मानवाधिकार संगठनों की छत्र-छाया पाकर भी, जुल्म का शिकार होने का रोना रो सकते हैं. आपकी चाकरी के लिए, आपके इशारों पर नाचने लिए दिन -रात देश के नेता, मीडिया और बुद्धिजीवी हाजिर रहते हैं. फिर भी इस देश के लोकतंत्र और 'सेकुलरिज्म' पर सवाल खड़े कर सकते हैं.

आप देशहित से ज्यादा अपने मजहब को रखते हैं. आप इरान में अमरीकी हमला होने पर नागपुर में हिदुओं के घर जला सकते है. तो अफगानिस्तान पर हमला होने पर लखनऊ में अन्य वर्गों की दुकाने जला सकते हैं. फिर भी 'इस्लाम खतरे में है' का एलान करके देश में फसाद कर सकते हैं. सात समंदर पार किसी अनजाने देश में अनजाने कार्टूनिस्ट द्वारा पैगम्बर साहब के कथित अपमान के नाम पर देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई की सड़के जाम कर सकते हैं. एक ऐसे ही फिल्मी 'सितारे' हैं इमरान हाशमी. आपको बता दे की कुछ साल पहले इस देश में एक और सेकुलर हाशमी पैदा हुए थे...सफ़दर हाशमी. जिनको कोंग्रेसी गुंडों ने मार दिया था लेकिन उनकी मौत के बाद उनकी बीवी शबनम हाशमी ने एक एनजीओ के नाम पर एक दूकान शुरू कर दी. मजेदार बात ये है कि आजकल वह उसी कोंग्रेस की छत्र-छाया में एनजीओ, सेकुलरिज्म, इनाम-इकराम की दूकान चला रही है. लेकिन उन हाशमी का इन हाशमी से कोई सम्बन्ध नहीं है. सिर्फ एक ही सम्बन्ध है कि वो भी सेकुलर थे... ये भी अपने सेकुलर अंकल महेश भट्ट की सरपरस्ती में सेकुलर बनने की तालीम ले रहे हैं. खबर ये हैं कि, हाशमी के अनुसार, मुम्बई के मशहूर पाली हिल इलाके में एक सोसायटी ने इमरान हाशमी साहब को मकान देने मना कर दिया, क्योंकि वह मुस्लिम हैं. फिर क्या था हाशमी साहब अपने सेकुलर अंकल के साथ पहुँच गए मीडिया और सरकार के पास. जो पहले से ही उनके लिए पलक-पांवडे बिछा कर बैठे थे. हकीकत ये है कि मुम्बई में कई शाकाहारी हिन्दू-जैन सोसायटियों में मांसाहारी हिन्दुओं को भी घर के लिए मना कर दिया जाता है. यहाँ तक कि यहाँ के मूल निवासी मराठियों को भी मना कर दिया जाता हैं. लेकिन आज तक सभी ने सोसायटी और शाकाहारी समुदायों की भावनाओं का ख़याल रखते हुए किसी किस्म का बवाल नहीं किया. और न ही महेश भट्ट जैसा कोई सेकुलर उनकी वकालात करने आगे आया. असली खबर यह है कि सोसायटी ने मना किया ही नहीं है. बल्कि हाशमी ने पब्लिसिटी स्टंट किया है. एक तो वह अपने अंकल की डी ग्रेड 'सेमी-न्यूड' फिल्मो के अलावा किसी और की फिल्म में आते नहीं, और अगर आते हैं तो फिल्म चलती नहीं. पता नहीं, आजकल कोई फिल्म उनके पास है या नहीं, लेकिन पब्लिसिटी तो मिल गयी!
खैर अल्पसंख्यक होने के नाते भेदभाव करने और परेशान करने का आरोप लगाना कोई नई बात नहीं है. इसके पहले शबाना आजमी ने भी मुस्लिम होने के नाते उन्हें मुम्बई में फ्लैट नहीं मिलने का रोना रोया था. जबकि सब जानते हैं कि उनके पिता के नाम पर मुम्बई के पोश इलाके में एक पार्क का नाम भी रखा हुआ है. इसके अलावा उनके पास मुम्बई और पुणे में कई सारे फ्लैट्स हैं. जब इस खुलासे के साथ शशिरंजन और अशोक पंडित जैसे कुछ फिल्मकारों ने प्रेस कोंफ्रेंस करके जनता को हकीकत बताई तो दूसरे दिन शबाना आजमी न केवल मीडिया की पहुँच से गायब हो गयी बल्कि, बोलती ही बंद हो गयी. सब जानते हैं कि शबाना आजमी और जावेद अख्तर को अन्य हिन्दू कलाकारों की कीमत पर इस देश ने ज्यादा सम्मान और प्यार दिया, सरकार ने भी उन्हें समय-समय पर सम्मानित किया लेकिन वह दोनों हिन्दू विरोध में कोइ क़सर नहीं छोड़ते. अपने पाप ढंकने के लिए मुस्लिम होने और भेदभाव होने का रोना रोने वाले और भी मामले अतीत में हो चुके हैं. कैसेट किंग गुलशन कुमार की ह्त्या के मामले में विदेश भाग गए संगीतकार नदीम ने और हाल ही में लोकसभा के जरिए कोंग्रेस के जरिए संसद में भेजे गए और मैच फिक्सिंग के आरोपों से गिरे क्रिकेटर अजहरुद्दीन ने भी अपने बचाव में मुस्लिम-अल्पसंखयक होने और भेदभाव होने का आरोप लगाया था. हैरत की बात है कि जब नदीम के गानों पर देश झूमता रहा और उसे सराहा तब उन्हें भेदभाव नहीं लगा. अजरुद्दीन के हजारों -लाखो फैन उनके खेल के दीवाने थे तब उन्हें भेदभाव नजर नहीं आया लेकिन जब कानून अपना काम करने लगा तब उन्हें अल्पसंख्यवाद और खुद का मुस्लिम होना याद आ गया.

लेकिन कई भले मुस्लिम भी हैं. दिवंगत फिरोज खान जैसे कलाकार पाकिस्तान में जाकर हिन्दुस्तान के अपमान पर पाकिस्तान को चेता कर खरी-खरी सुना दी थी. हैरत की बात है कि तब भी हमारे सेकुलर मीडिया और महेश भट्ट को पेट में मरोड़ आ गयी थी कि फिरोज ने गलत किया! मुम्बई में ही कई मुस्लिम कलाकारों के फ्लैट्स और बंगले बने हुए हैं. शाहरुख का चर्चित बंगला 'जन्नत' तो सभी जानते हैं. मजेदार बात यह है कि पाकिस्तान से आये मुस्लिम कलाकार अदनान सामी के भी मुम्बई में १२ फ्लैट्स हैं. जब मुम्बई में पाकिस्तानी मुस्लिम को भी इतने सारे फ्लैट्स मिल सकते हैं तो हिन्दुस्तानी मुस्लिम इमरान हाशमी और शबाना आजमी को फ्लैट नहीं मिलने वाली बात में कितनी सचाई है. दूसरी बात ये कि आज तक किसी भी अन्य तथाकथित अल्पसंख्यक वर्ग के व्यक्ति ने मुम्बई में घर नहीं मिलाने और भेदभाव का आरोप नहीं लगाया. चाहे वह जैन हो या बौद्ध, सिक्ख हो या पारसी, ईसाई हो या अहमदिया. जिस निबाना सोसायटी ने कथित तौर पर इमरान हाशमी को फ्लैट देने के लिए मना किया था वहीं पर राजा मुराद भी रहते हैं. उन्होंने हाशमी की बात को खारिज किया है. साथ ही मीडिया द्वारा विलेन के रूप में निरुपित सलमान खान ने भी खुलकर इस आरोप को गलत ठहराया. हालांकि शाहरुख खान ने बड़ी कुटनीती से जवाब देते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया तो बात-बेबात पर मीडिया में छाए रहने वाले 'सेकुलर' आमिर खान ने तो हाशमी के बयान पर कोई स्पष्ट बात करना ही मुनासिब नहीं समझा. आखिर अपने व्यक्तिगत मामलों को मजहब से जोड़कर उसे साम्प्रदायिक रंग देना किस किस्म का सेकुलरिज्म है? इसका जवाब तो भारत के लोकतंत्र और सेकुलरिज्म पर बार-बार सवाल उठाने वाले महेश भट्ट, शबाना आजमी, जावेद अख्तर जैसे लोग ही दे सकते हैं. यह लोग देश में किस तरह का सेकुलरिज्म चाहते हैं? क्या यह हस्तियाँ कल्पना कर सकती हैं, कि शबाना, महेश भट्ट और हाशमी जैसे लोगों के बयानों के कारण देश के हिन्दू-मुस्लिमो के बीच सदभाव कितना बिगड़ सकता है?
खैर ऐसे सवाल पूछने की हिम्मत न तो हमारे मुख्यधारा के मीडिया के पास है ना ही सेकुलर नेताओं के पास. और इन शबानाओं, महेश भट्टों और हाशमियों के बयान ही पाकिस्तान और कट्टरपंथी मुल्लाओं के हथियार बन जाते हैं.

07 अगस्त 2009

महाराष्ट्र सरकार द्वारा पुलिस में १०% मुस्लिम आरक्षण का नजराना

चुनाव के ठीक पहले अब पुलिस में भी सेकुलरवाद और सच्चरवाद का काला साया

करीब तीन माह बाद महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में भला राज्य की कोंग्रेस-एनसीपी सरकार थोक के भाव मिलने वाले मुस्लिम वोटों को कैसे अनदेखा कर सकती है? लिहाजा इस 'सेकुलर' सरकार ने महासेकुलर सच्चर रिपोर्ट का हवाला देते हुए पुलिस विभाग में १०% मुस्लिम आरक्षण का झुनझुना थमा दिया है. इसके साथ ही पुलिस की नौकरी में चयन से पूर्व शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए २.१७ करोड़ भी आबंटित किये हैं. और पुलिस महकमे में मुस्लिमों की विशेष भर्ती को गति देने के लिए सरकारी खर्च पर महाराष्ट्र के प्रत्येक जिले में शिविर भी आयोजित किये जायेंगे. करदाताओं की गाढी कमाई से अपने वोट बैंक की चापलूसी करना कौनसा सेकुलरिज्म है? यह तो शायद सोनिया, पवार, राहुल जैसे लोग ही बता पाएंगे.

एक तरफ प्रदेश की पुलिस लाठी और पुराने हथियारों के बल पर अति-आधुनिक हथियारों और एके-४७ से लैस बेरहम आतंकवादियों का सामना करने को मजबूर है. जिसके आधुनिकरण और सक्षम बनाने का मुद्दा धुल चाट रहा है, लेकिन मुस्लिमों के कथित पिछडेपन के नाम पर अपनी वोट बैंक की रोंटियाँ सेंक कर कोंग्रेस-एनसीपी सरकार आतंरिक सुरक्षा के लिहाज से अहम पुलिस विभाग का कबाडा करने पर तुली हुई है. आरक्षण एक बार फिर वोट हथियाने का बहाना बन गया है. मजे की बात ये है कि महाराष्ट्र की इस सेकुलर सरकार के सेकुलर अल्पसंख्यक मंत्री अनीस अहमद द्वारा के 'अल्पसंख्यकों' के नाम पर खेले गए इस खेल में सिख, ईसाई, पारसी, नवबौद्ध और जैन सरीखे अल्पसंख्यक वर्गों का कोई व्यवस्था नहीं है. खैर, आइए अंगरेजी अखबार DNA, Mumbai में इस सम्बन्ध में छपे समाचार पर गौर करते हैं:


State wants 10% of cops to be Muslims

Allocates Rs2.17 crore to set up pre-selection camps for minorities in all districts

Surendra Gangan

To raise the percentage of Muslims in the police force from from 4 to 10, the state minority department has introduced an ambitious pre-selection training programme that aims to train 3,500 youth from minorities sections. The state has allocated a fund of Rs2.17 crore for the two-month camps in all districts across the state. It has also proposed to hike the attendance allowance to Rs2,000 per year for minority students in classes V to VII to decrease the dropout rate.
According to the Sacchhar committee report released in 2006, nearly 5% constables in the police force are from the Muslim community, against its population share of 10.5 % in the state. The state government, of late, has been taking measures to increase the percentage of Muslims in government services by introducing Marathi in Urdu schools and appointing a DCP rank official at the recruitment centres for constables. The latest scheme is to train 100 candidates per district to facilitate selection in police recruitment.
"Muslim and other minority community candidates appearing for the police recruitments face problems while answering Marathi question papers. The training camp will focus on training them in Marathi, general knowledge and also in physical tests. We have raised the remuneration of the teachers and have also offered a monthly stipend of Rs1,500 to candidates selected in these camps," said minority minister Anees Ahmed.
"The candidates chosen for the training will be given study material, track suits and quality food during the training," said TF Thekkekara, principal secretary, minorities department. The scheme is open to all the five minority communities, but has the provision of accommodating only Muslim candidates if youths from other minorities don't make up the adequate percentage.
The department has also proposed to hike the attendance allowance for minority students in fifth and seventh standard. According to the proposal, the attendance allowance of Rs20 per day, is aimed at reducing the dropout rate among minorities. The proposed hike is nearly five times the present amount.
"At the secondary school level, the dropout rate among Muslim students is 43.2 %, against 41% in scheduled tribes and 23.9 % in the general category. Among male Muslim students, it is worse. The scheme would be sanctioned by the cabinet in next few days," said Ahmed.

(Source: DNA, Mumbai, 06 August, 2009)

05 अगस्त 2009

पासवान को चाहिए धर्म के नाम पर आरक्षण !

अपने फायदे के लिए वास्तविक दलित हितों पर कुठाराघात की साजिश.

कभी बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री का झुनझुना चलाने वाले कथित दलित नेता रामविलास पासवान ने अब मुस्लिमों और ईसाइयों के आरक्षण का राग अलापना शुरू कर दिया है. चार साल पहले मुख्य मंत्री की कुर्सी के लिए लालू के घोर विरोधी रहे पासवान ने लालू के साथ केंद्र की कोंग्रेस सरकार में सत्ता सुख लिया. फिर लोकसभा चुनावों में नीतीश को हारने के लिए लालू से ही दोस्ती गाँठ ली. फिर भी हाल ही के लोकसभा चुनाव में करारी हार ही मिली. दलित नेता होने के बावजूद मायावती जैसी दूसरी दलित नेताओं से द्वेष रखकर दलित एकता में ही बाधा बननेवाले पासवान ने दलितों के नाम पर काफी सत्ता सुख भोगा. अब केवल दलितों की पैरवी से ही पेट नहीं भरता देख दलितों को छोड़ अब वह मुसलमानों के भी मसीहा बनने के फिराक में हैं. अब वह पिछडे और वंचित दलितों को मिलने वाले आरक्षण में बंटवारा करके आरक्षण की रेवड़ी मुस्लिमों और ईसाइयों के देना चाहते हैं. पासवान का मानना है कि, दलित हित और हक जाए भाड़ में मुस्लिमों और ईसाइयों को मक्खन बांटा जाए. पासवान का हिसाब सीधा-सा है... दलित हितों के नाम पर इतना सफ़र काफी है अब आगे का सफ़र दलितों का हक छीनकर मुस्लिमों व ईसाइयों में बांटकर सत्ता सुख भोगा जाए. हमारे देश में आरक्षण, केवल सत्ता हथियाने का साधन बन गया है. इस बार लालू, मुलायम, मायावती, कम्युनिस्टों और कोंग्रेस सभी को पछाड़कर पासवान ने मुस्लिम-ईसाई आरक्षण का राग छेड़ा है. यानी उन्हें क्रेडिट मिलना और थोक के भाव वोट मिलना तय है. सेकुलरिज्म यानी धर्मनिपेक्षता के नाम पर मजहब आधारित आरक्षण की मांग करना क्या साम्प्रदायिकता नहीं है? यह कौनसा सेकुलरिज्म है? जाहिर है कोई सेकुलर चैनलवाला या पत्रकार यह सवाल नहीं उठाएगा. अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछाडे वर्ग, महिलाओं और दलितों के हक छीनना कौनसा सामाजिक न्याय है? इसका जवाब भी सेकुलकर बिरादरी के पास नहीं है. हाँ, लेकिन इसका जवाब भारत के दलित और वंचित वर्ग जरूर दे सकते हैं. आइए दैनिक जागरण में छपी खबर पर गौर करते हैं...

पासवान ने खेला मुस्लिम कार्ड
दैनिक जागरण ५ अगस्त

पटना [जागरण ब्यूरो]। आम चुनावों में सूपड़ा साफ होने के बाद लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान अब बिहार में अपनी जमीन तलाशने में जुटे हैं। इस कवायद के तहत बुधवार को उन्होंने मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा उठाया।

मुस्लिम कार्ड खेलते हुए पासवान का कहना था कि नीतीश सरकार अगर अपने आपको मुस्लिमों का हितैषी कहती है तो पिछड़े मुसलमानों को नौकरियों में दस प्रतिशत आरक्षण देने की व्यवस्था करे।

एस के मेमोरियल हाल में लोजपा अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के राज्य स्तरीय सम्मेलन में पासवान ने यह मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश करे और उनकी सिफारिशों को शत प्रतिशत लागू करे। लोजपा नेता का कहना था कि दलित मुस्लिम व दलित ईसाई के लिए नौकरियों में अलग से आरक्षण का प्रावधान किया जाना चाहिए। पासवान ने कहा कि हर हाल में पिछड़े मुस्लिमों के लिए नौकरियों में दस प्रतिशत का आरक्षण किया जाना चाहिए।

पासवान ने कहा 1956 में संविधान की धारा 341 के तहत पिछड़े सिखों को भी दलितों की सूची में शामिल कर लिया गया और ठीक इसी तरह 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने नवबौद्धों को दलितों की सूची में शामिल कर लिया। इसी तर्ज पर यह सुविधा दलित मुसलमानों और ईसाइयों को मिलनी चाहिए.

(साभार: दैनिक जागरण)


01 अगस्त 2009

सेकुलर-साहबजादे का कारनामा!

बिहार में राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल में लोकतंत्र का गला घोंट देने वाले वरिष्ठ कोंग्रेसी नेता बूटा सिंह का साहबजादा स्वीटी उर्फ़ सोरबजीत सिंह रिश्वत लेते पकडा गया. वह नासिक के किसी फर्जी केस में आरोपी को बचाने के लिए करोडो रुपये ऐंठने की फिराक में था.
मामला ये था कि किसी तथाकथित ऊंची जाति के व्यापारी ने अपने तथाकथित नीची जाति के कर्मचारी को अपशब्द कह दिए हैं. सो 'नीची' जाति वाले ने 'ऊंची' जाति वाले अपने मालिक के खिलाफ केस ठोंक दिया. मामला अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के पास आ गया जिसके अध्यक्ष हैं माननीय बूटा सिंह जी. अब सामाजिक और सही न्याय तो एक तरफ, मामला सलटाने के लिए लोग उनके साहबजादे की दूकान पर नहीं तो और कहाँ जायेंगे? यही नहीं अपना सेकुलर-नंदन स्वीटी हवाला का कारोबारी भी निकला. बात यही नहीं रुकती, उनके घर पर छापे के दौरान घातक हथियार भी मिले.
आइये अब गौर करते हैं कि बूटा सिंह की पार्टी क्या कह रही है. उनकी पार्टी के युवराज राहुल बाबा अपने नेता के युवराज की इस करतूत पर मौन हैं. कलावती पर लंबा भाषण झाड़नेवाले राहुल बाबा अपनी ही पार्टी से जुड़े इस युवा कलाकार की कलाबाजी पर खामोश हैं. दलित के घर भोजन करने की नौटंकी करने वाले राहुल बाबा दलितों के लिए बने आयोग के मुखिया बूटा सिंह के घर में चल रहे दलित मामले को दबाने के छल पर भी खामोश हैं. दूसरी और कोंग्रेस पार्टी अपना पल्ला झाड़ते हुए कह रही है कि बूटा से हमारा कोई नाता नहीं है! अमां ऐसा है तो फिर आपने बूटा को आयोग का चेयरमेन कैसे बना दिया?
हम तो यही कहेंगे कि, भाई जनता को सेकुलर सरकार चाहिये तो सेकुलर नेताओं और उनके साहबजादो की भ्रष्ट करतूतों को तो झेलना ही पडेगा!! जय हो!!

29 जुलाई 2009

सेकुलर सा'ब, तो भ्रष्टाचार माफ़!

हमारे देश में सेकुलरिज्म के नाम पर कुच्छ भी सहन किया जा सकता है. आप चाहे जनता पर महंगाई लादो या भ्रष्टाचार करो सब कुछ माफ़ है, बशर्ते आप सेकुलर हो. सेकुलरवाद का नारा देकर ही लालूजी ने १५ साल तक बिहार पर राज करते हुए जनता और प्रदेश का जो कबाडा किया वह सब जानते हैं. कभी नालंदा, तक्षशिला की भूमि के रूप में ख्यात रहा और भारत का मस्तक कहा जानेवाला बिहार देश के पिछडे प्रदेशो में गिना जाने लगा. विकास और जनहित समेत ईमानदारी और सुशासन जाए भाड़ में, हम तो सेकुलर हैं. और प्रजा पर राज करने के लिए सिर्फ सेकुलर होना ही काफी है. कोंग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री आनंद शर्मा की करतूत ही देख लीजिए. बी एम् डब्ल्यू मामले में एक वकील होने के नाते उन्होंने क्या किया यह सबके सामने है. ज्यादा जानकारी के लिए दैनिक जागरण में छपी पूरी खबर हूँ-ब-हूँ पेश है. अमां अब क्या कहें, आनंद शर्मा ठहरे महान सेकुलर दल के महान सेकुलर नेता... सो उनका गुनाह देश की जनता को माफ़ करना ही होगा. आइए दैनिक जागरण में छपी खबर पर गौर फरमाते हैं:

कांग्रेस ने आनंद से पल्ला झाड़ा

नई दिल्ली। कांग्रेस पार्टी ने अदालत की अवमानना के मामले में दोषी करार दिए गए बीएमडब्ल्यू मामले के अभियुक्त संजीव नंदा के वकील आर के आनंद से खुद को दूर कर लिया है। आनंद ने कांग्रेस पार्टी के टिकट पर 2004 में लोकसभा का चुनाव लड़ा था।

पार्टी प्रवक्ता शकील अहमद ने कहा कि यह आनंद और न्यायालय के बीच का मामला है। हमें इस मामले के संबंध में कोई राजनीतिक बयान नहीं देना है।

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखने का निर्णय दिया, जिसमें आनंद को अदालत की अवमानना का दोषी करार दिया गया था।

इससे पहले, हाईकोर्ट ने एक समाचार चैनल के स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर आनंद को दोषी ठकराया था। स्टिंग में दिखाया गया था कि बीएमडब्लयू मामले के अभियुक्त संजीव नंदा के वकील आनंद इस मामले में सरकारी वकील आई. क्यू. खान के साथ मिलकर नंदा को बचाने के लिए प्रयास कर रहे थे।

विधि जगत ने भी की सराहना:----

बीएमडब्ल्यू मामले में अदालत की अवमानना करने वाले जानेमाने वकील आर के आनंद की सजा बरकरार रखे जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की विधि जगत में यह कहते हुए सराहना की गई कि यह निर्णय वकालत के पेशे के लिए अच्छा है और इससे तंत्र को साफ सुथरा बनाने में मदद मिलेगी।

जानेमाने वकील राम जेठमलानी और के.टी.एस. तुलसी ने इस फैसले का यह कहते हुए स्वागत किया कि इससे पेशे की 'गरिमा' बहाल करने में मदद मिलेगी। बीएमडब्ल्यू 'हिट एंड रन' मामले में संजीव नंदा का बचाव करने वाले जेठमलानी ने कहा, 'मैं फैसले से खुश हूं लेकिन चीजें अभी भी छिपी हुई हैं और किसी दिन उन्हें भी उजागर होना होगा। यह हमारे लिए और विधि तंत्र के लिए अच्छा है। वह [आनंद] सजा का हकदार है क्योंकि उसने अपने मुवक्किल की कीमत पर रुपया कमाने की कोशिश की।

के.टी.एस. तुलसी ने कहा कि सत्य की विजय हुई। टेप की रिकॉर्डिंग की विश्वसनीयता पर कभी कोई संदेह नहीं था। यह बेहद दुख की बात है कि अंतिम निर्णय आने में लंबा समय लगा। लेकिन मुझे खुशी है कि सुप्रीम कोर्ट ने वकालत के पेशे के महत्व को दोहराया और यह समाज एवं अदालत का कर्तव्य है। वकीलों के लिए आत्मनिरीक्षण की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि हम वकीलों को यह याद रखने की जरूरत है कि वकालत का पेशा कोई व्यापार या व्यवसाय नहीं बल्कि एक नोबेल पेशा है।

अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि आनंद पर उम्रभर के लिए प्रैक्टिस करने पर रोक लगाई जानी चाहिए क्योंकि उन्होंने जो किया, वह 'पेशागत मूलभूत दुराचरण' है। उन्होंने कहा कि यह एक अलग मामला नहीं है। कई मामलों में गवाहों को प्रभावित किया गया और बार काउंसिल उन प्रभावशाली वकीलों के खिलाफ कोई कार्रवाई करने में विफल रही। भूल करने वाले वकीलों के लिए यह मामला एक नजीर पेश करेगा। भूषण ने कहा कि बार काउंसिल की विफलता को देखते हुए वकीलों के लिए कोई आंतरिक नियामक निकाय होना चाहिए.

(Source:दैनिक जागरण) Jul 29, 05:23 pm